प्राचीन नर्मदा:-

नर्मदा मात्र नदी नहीं यह एक संस्कृति हैं, जो सदियों से प्रवाहित हो रही हैं। नर्मदा प्रकृति की अद्भूत देन है। पौराणिक नदी नर्मदा का वैदिक साहित्य के अंतर्गत ऋगवेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद में चारों वैदिक संहिताएँ, ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्य ग्रंथ एवं उपनिषद ग्रंथो में इसका उल्लेख मिलता है। शतपथ ब्राह्मण वैदिक साहित्य का महत्वपूर्ण ब्राम्हण ग्रंथ है। उसमें ’’रेवोत्तर’’ या रेवोत्तरसम शब्द का प्रयोग मिलता है। नर्मदा नदी अनुपपुर जिले के उत्तरी अक्षांश 22.40 एवं पूर्वी देशांश 80.45 अमरकंटक से 1051 मीटर की ऊंचाई से निकलकर भड़ौच (गुजरात) के उत्तरी अक्षांश 21.43 एवं पूर्वी देशांश 72.57 के निकट खंभात की खाड़ी में गिरती है। नर्मदा नदी की कुल लंबाई 1312 कि.मी. है। हर युग में नर्मदा का महत्व रहा हैं। फलस्वरूप नर्मदा जी को माँ का दर्जा मिला। नर्मदा माँ ने अपने गोद मंे अनेक संस्कृतियों को पल्लवित,पोषित कर विकसित किया था। सत्त् प्रवाहित माँ नर्मदा युगों-युगों तक मानव कल्याण एवं सिद्धियों को ज्ञान देती रही। नर्मदा केवल शैव धर्म से ही संबंधित नहीं, अपितु वैष्णव धर्म ,शाक्त ,जैन धर्म तथा सिक्ख सम्प्रदाय एवं मुस्लिम धर्म की सांस्कृतिक धरोहर भी नर्मदा तट पर स्थापित है । नर्मदा तट प्राचीन काल से अनेक ऋषि-मुनियों की तपोस्थली ,आदिगुुरु शंकराचार्य की तपोस्थली, जैनाचार्यो की तपोस्थली, गुरुनानक देव जी ने भी नर्मदा की परिक्रमा की थी, नर्मदा तट पर चादरशाह गुरुव्दारा तथा मुस्लिम सम्प्रदाय के सुफी संतो का मकबरा आदि की उपस्थिति, नर्मदा को सर्वधर्म सम्भाव की नदी देवी निरुपित करती है और नर्मदा तट को देश की सर्मधर्म सांस्कृतिक सद्भाव का प्रमुख क्रेन्द्र होने का गौरव प्राप्त होता है ं नर्मदा, एवं अभिलेखों में, शास्त्रों में, शिल्पकलाओं में नर्मदा का वर्णन इस कृति की उपलब्धि हैं, जो सुधि पाठकों, शोधार्थियों एवं श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों के लिए उपयोगी होगी ऐसी कामना करता हूॅ ।

प्रकाशक - बी.आर. पब्लिशिंग कार्पोरेशन नई दिल्ली - प्रथम संस्करण वर्ष 2014
मूल्य - 1750/- आई.एस.बी.एन. 9789350501511
लेखक - डॉ. हेमू यदु, एल.आई.जी.-20,शैलेन्द्र नगर रायपुर छत्तीसगढ़ मो.- 094252-12537



 

 

 

 
 
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