दक्षिण कोसल की कला

कला का सौन्दर्य किसी पात्र में नहीं, अपितु देखने वाले की आँखों में होता हैं। भारतीय कला में दक्षिण कोसल की कला का अभूतपूर्व योगदान हैं। दक्षिण कोसल, छत्तीसगढ़ का प्राचीन नाम हैं। यहाँ की मूर्तिकला को दक्षिण कोसल शैली कहा जाता हैं। छत्तीसगढ़ प्राचीन काल से कला केन्द्र के रूप में विख्यात रहा हैं। यहाँ सिरपुर, मल्हार, डीपाडीह, ताला, आरंग, राजिम, पचराही जैसे अनेक कला केन्द्र थे, जिनकी कृतियाँ पूरे विश्व में विख्यात थी। आज ये धरोहर के रूप में विद्यमान हैं। इस कृति में प्रथम बार दक्षिण कोसल की कला को रेखांकित करने का प्रयास किया गया हैं, जो भारतीय कला को अग्रणीय बनाने में सहयोगी हैं। इस कृति में रायपुर संग्रहालय में संग्रहित छत्तीसगढ़ की मूर्तिशिल्प को आधार लिया गया है। यह कृति शोधार्थी, इतिहासकार, पाठकों एवं प्रतियोगी परिक्षाओं के विद्यार्थी के लिए उपयोग होंगे। (जिल्द में मूल्य-250 रू., रामानंद विद्या भवन, नई दिल्ली)



 

 

 

 
 
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