छत्तीसगढ़ के प्राचीन धरोहर एवं तीर्थ

छत्तीसगढ को सांस्कृतिक धरोहर की नगरी कहा जाता है। छत्तीसगढ़ को प्रकृति की अनुपम देन है। इस अंचल की प्राकृतिक सुषमा एवं भौगोलिक सुन्दरता के कारण नदी घाटियों में अनेक संस्कृतियों उद्भव एवं विकास हुआ। तत्कालीन शासको ने अपनी संस्कृति उत्कृष्ट कार्य की पहचान कराने एवं अपने इष्टदेवों को स्थापित कर उसे चिरस्थायी बनाने के उद्देश्य से अनेक उपासना गृह एवं स्मारक आदि का निर्माण करवाया था। जो अब छत्तीसगढ के प्राचीन धरोहर के रुप में विख्यात है। पौराणिक महानदी की घाटी में अनेक संस्कृतियों का उद्भव हुआ अपने हृदयस्थल में अनेक संस्कृतियों की गाथा लिये सरस सलिला आदिकाल से निरन्तर प्रवाहित है। छत्तीसगढ की नदियों के तट पर अनेक संस्कृतियों के धरोहर आज भी उनकी पुण्य स्मृति में तीर्थकला के रुप में विद्यमान है।
भारतीय संस्कृति में नदियों के संगम स्थल को पुण्य तीर्थ होने का गौरव प्राप्त है। इन तीर्थ स्थलों पर स्नान-दान की प्राचीन परम्परा मिलती है। छत्तीसगढ की प्राचीन नदी महानदी का राजिम के पास तीन नदियाँ सोण्डूर, पैरी एवं महानदी का संगम होता है, इसे छत्तीसगढ का प्रयागतीर्थ कहा जाता है। राजिम की धार्मिक महत्ता इतनी बढ़ गयी है, अब इसे पाँचवे कुम्भ होने का गौरव प्राप्त है। कमल क्षेत्र के रुप में विख्यात राजिम में पंचकोशी यात्रा का भी महत्व है। इसी प्रकार छत्तीसगढ शिवरीनारायण को भी अपनी धार्मिक महत्ता के कारण बद्रीतीर्थ के रुप में मान्यता है। जांजगीर जिले में गंुजी नामक स्थान है, जहाँ पर एक शिलालेख में ऋषभतीर्थ का उल्लेख मिलता है। छत्तीसगढ का बिलासपुर संभाग जैन धर्म प्रमुख केन्द्र रहा है। यहाँ बकेला पचराही पण्डरिया से लेकर गुंजी एवं बुढ़ीखार तक का पूरा बेल्ट प्राचीन जैन धर्म का प्रभावित क्षेत्र था। यहाँ अनेक तीर्थकरो का आगमन, चौमासा होने की जानकारी मिलती है। जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव की मल्हार के पास ग्राम बुढीखार में 6-7 प्रतिमा एक ही स्थान में स्थापित होने से यहाँ ऋषभदेव का चौमासा स्थल होने का गौरव प्राप्त है। जिसके कारण इसे ऋषभतीर्थ भी कहें, तो कोई अतिसंयोक्ति नहीं होगी। छत्तीसगढ के सिरपुर को बौद्धों की नगरी होने का गौरव प्राप्त है। सिरपुर के उत्खनन कार्य से प्रकाश में आये अनेक बौद्ध बिहार एवं बौद्ध स्तुप इसकी पुष्टि करते है। महात्मा बुद्ध एवं चीनीयात्री व्हेनसॉग की सिरपुर यात्रा तथा बोधिसत्व नागार्जुन का संबंध सिरपुर से होने की पुष्टि होती है। अतः सिरपुर को बौद्धतीर्थ के रुप में प्राचीन मान्यता को स्वीकार करने में कोई अतिसंयोक्ति नही है। इसी प्रकार वल्लभ सम्प्रदाय के प्रवर्तक वल्लभाचार्य की जन्म स्थली राजिम के पास महानदी के तट पर चम्पारण्य नामक स्थान है। इस कारण से देश में चम्पारण वल्लभाचार्य के तीर्थ स्थल के रुप में विख्यात है। छत्तीसगढ का कुल धर्म शैव है, यहाँ गुफाओं, कन्दराओं, पहाड़ी एवं मैदानी व वन्य क्षेत्र में शिवमंदिर एवं शिवलिंग की स्थापना होने की प्राचीन परम्परा मिलती है। इस कारण से छत्तीसगढ को शैवतीर्थ होने प्राचीन मान्यता है। यहाँ का प्राचीन भोरमदेव शिव मंदिर, लक्ष्मणेश्वर महादेव-खरौद, केंवटीन शिवमंदिर पंुजारीपाली, शिवमंदिर धोबनी, शिवमंदिर मल्हार, सिद्धेश्वर महादेव पलारी, गंधेश्वर शिवमंदिर सिरपुर, कुलेश्वर महादेव राजिम, पंचकोशी के शिवमंदिर तथा सिहावा का शिवमंदिर प्रमुख है। इन शिवमंदिरों में महाशिवरात्रि एवं श्रावण मास के विशेष दर्शन का महत्व है। नदी तट पर बने इन मंदिरों में स्नान-दान की प्राचीन परम्परा मिलती है। इन मंदिरों में पुष्प के साथ अक्षत चढ़ाने की परम्परा मिलती है। इसी कारण से इसे धान का कटोरा भी कहा जाता है। इसी प्रकार छत्तीसगढ में शाक्त सम्प्रदाय का अत्यधिक प्रभाव है। इस अंचल की प्रमुख शक्तिपीठ में डोगरगढ़ की बम्बलेश्वरी माता, रतनपुर की महामाया देवी, दन्तेवाड़ा की दन्तेश्वरी देवी प्रमुख है। इन देवी मंदिरों में दोनों नवरात्रि में विशेष मेला भरता है। इस कारण से इन स्थानों का शक्तितीर्थ के रुप में अंचल मंें मान्यता है। इस कृति में छत्तीसगढ़ के प्राचीन धरोहर एवं तीर्थ पर प्रथम बार प्रकाश डाला गया है, जो अध्ययेताओं, विद्यार्थियों, पाठकों एवं इतिहासकारों के लिए ज्ञानवर्धक एवं संग्रहणीय है।

लेखक- डॉ. हेमू यदु
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