• 1. सिरपुर उत्खनन से प्रकाश में आये बौद्ध बिहार जिसमें महात्मा बुद्ध की ध्यान मुद्रा में प्रतिमा है। आठवीं शताब्दी की यह प्रतिमा ईट से बने बौद्ध बिहार में मिली हैं।
  • 2.देवरानी जेठानी मंदिर के भग्नावशेष ताला ग्राम, बिलासपुर में प्राप्त हुआ हैं। जेठानी मंदिर के भग्नावशेष में उपलब्ध यह प्रतिमा धुमावती की है, जिसे ज्येष्ठा भी कहा जाता है। ज्येष्ठा, जेठानी का ही अपभ्रंश हैं। भगवान शिव को पार्वती द्वारा सिर से मुक्ति देते हुए यह प्रतिमा अद्भूत एवं विस्मयकारी मुद्रा में हैं। छठवीं शताब्दी की उत्कृष्ट कलाकृति मानी जाती हैं। ताला ग्राम तारा शक्तिपीठ के रूप में विद्यमान था। छत्तीसगढ़ी मंे ताला को ही तारा कहा जाता है और कालान्तर में यहीं तारा शब्द ताला हो गया।
  • 3. ताला ग्राम की यह अद्भूत विश्व में दुर्लभ प्रतिमा मानी जाती हैं। इस प्रतिमा के अंग-अपांगों मंे विविध जीव-जन्तुओं का चित्रांकन इस प्रतिमा को दुर्लभ बनाती हैं। 12 राशियों को सांकेतिक रूप से शिल्पांकित कर इस प्रतिमा को ज्योतिष में उल्लेखित कालपुरूष की की प्रतिमा मानी जाती हैं। 5-6वीं शताब्दी की यह छत्तीसगढ़ की उत्कृष्ट कलाकृति हैं। इस रहस्यमय प्रतिमा पर यूरोप एवं एशिया के पुरातत्वविदो के लिए कौतुहल बना हुआ हैं। इस पर निरन्तर शोध किये जा रहे हैं। इसके कालभैरव, पशुपतिनाथ, शिव का विश्वरूप, रौद्र शिव आदि अनेक नामकरण हुए है, किन्तु 12 राशियों पर धारित कालपुरूष का नामकरण प्रतिमा के लिए उपयुक्त माना जाता हैं।
  • 4.ग्राम करहीभदर, जिला-दुर्ग की यह अद्भूत महापाषाण युगीन कलाकृति हैं। छत्तीसगढ़ में महापाषाण युग के समय मृतकों को दफनाने के पश्चात् उनकी स्मृति में बड़े-बड़े शिलाखण्ड गाड़ दिये जाते थे। इन्हीं शिलाखण्डों पर यह एक मात्र ऐसा शिलाखण्ड है, जिसे मूर्ति का आकार दिया गया हैं। महापाषाण कालीन मूतिशिल्प की दुर्लभ कलाकृति हैं।
  • 5.सरगुजा के डीपाडीह स्थित सामंत सरना से प्राप्त यह दुर्लभ प्रतिमा मालाधारिणी नायिका की हैं। यह मंदिर के भग्नावशेषों से प्राप्त हुई हैं। यह 10वीं शताब्दी की उत्कृष्ट कलाकृति मानी जाती हैं।
  • 6.सरगुजा के डीपाडीह से प्राप्त यह दुर्लभ प्रतिमा शिव परिवार के कार्तिकेय की मानी जाती हैं। इस प्रतिमा में कार्तिकेय, जिसे स्कन्द देव भी कहा जाता हैं। दक्षिण भारत में मुरूगन देव के नाम से प्रसिद्ध हैं। इस प्रतिमा में मयूर पर आसीन कार्तिकेय को प्रदर्शित किया गया हैं। 10वीं शताब्दी की यह दुर्लभ प्रतिमा हैं।
  • 7.सिरपुर के लक्ष्मण मंदिर के मुख्य द्वार के दाहिनी ओर शिल्पांकित यह दुर्लभ प्रतिमा नायक-नायिका की हैं। आठवीं शताब्दी की यह प्रतिमा छत्तीसगढ़ की उत्कृष्ट कलाकृति मानी जाती हैं।
  • 8.सरगुजा के डीपाडीह से प्राप्त 9-10वीं शताब्दी उमा-महेश्वर की उत्कृष्ट कलाकृति हैं। इस प्रतिमा में शिव पार्वती आंलिगनबद्ध मुद्रा में प्रदर्शित किये गये हैं। दक्षिण कोसल की मूर्तिकला में उमा-महेश्वर की सौन्दर्यमय कलाकृति के रूप में पूरे प्रदेश में प्रसिद्ध हैं।
  • 9.जिला राजनांदगांव के घटियारी नामक स्थान से प्राप्त यह दुर्लभ प्रतिमा रामायण कालीन प्रसंगों को उद्धृत करती हैं। इस प्रतिमा में अशोक वाटिका का दृश्य है। जिसमें माता सीता को प्रभु श्रीराम की अंगुठी दिखाते हुए प्रदर्शित की गई हैं। 10-11वीं शताब्दी की यह दुर्लभ प्रतिमा मानी जाती हैं।
  • 10.शिवजी की अद्भूत कलाकृति सरगुजा के डीपाडीह से प्राप्त हुई है, जिसमें को शिवजी को भैरव रूप में प्रदर्शित किया गया हैं। शिवजी की भैरव प्रतिमा स्थानक रूप में प्रदर्शित हैं। 9-10वीं शताब्दी की उत्कृष्ट कलाकृति मानी जाती हैं।
  • 11.छत्तीसगढ़ में देवियों का भी प्रमुख स्थान रहा हैं। माता पार्वती की शक्ति रूप में महिषासुर मर्दिनी स्वरूप प्रसिद्ध मानी जाती हैं। डीपाडीह से प्राप्त इस प्रतिमा में पार्वती महिषासुर को मर्दन करते हुए प्रदर्शित की गई हैं। 9-10वीं शती ईस्वी की यह दुर्लभ प्रतिमा हैं।
  • 12.11वीं शताब्दी का भोरमदेव मंदिर। इस मंदिर का पृष्ठभाग जिसमें उत्कृष्ट शिल्पकारी एवं मंदिर वास्तुकला प्रदर्शित हैं।
  • 13.कवर्धा जिले मंे स्थित भोरमदेव मंदिर की उत्कृष्ट कलाकृति जिसमें मिथुन प्रतिमाएँ एवं नृत्य संगीत की प्रतिमाओं को उकेरा गया हैं। 11वीं शताब्दी की उत्कृष्ट कलाकृति हैं।
  • 14.पाली का प्रसिद्ध शिव मंदिर। इस मंदिर की कलाकृति की विशेषता है कि इसमें मुगल कालीन कला का उत्कीर्ण होना छत्तीसगढ़ की मंदिर वास्तुकला का अद्भूत उदाहरण हैं। यह मंदिर जिसमें मुगल आर्ट की पच्चीकारी को उकेरा गया हैं। दक्षिण कोसल कला एवं मुगल आर्ट दोनों का समन्वय रूप इस मंदिर की शिल्पकला का उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
  • 15.पाली की सुन्दर कलाकृतियों में यह सुन्दर प्रतिमा नायिका की हैं। छत्तीसगढ़ की मूर्तिशिल्प में नायिका के अनेक स्वरूपों की प्रतिमा मिलती हैं। जिसमें पाली की यह प्रतिमा उत्कृष्ट मानी जाती हैं।
  • 16.सिरपुर में स्थित ईटों की कलाकृति पूरे विश्व में प्रसिद्ध हैं। ईंटों से निर्मित लक्ष्मण मंदिर में कोमल ईंटों से तराशी गई। पुष्प की अद्भूत कलाकृति इस मंदिर की मूर्तिशिल्प को दुर्लभ बनाती हैं। आठवीं शताब्दी की यह अद्भूत कलाकृति जिसे महारानी वासटा देवी द्वारा इस मंदिर का निर्माण अपने पति हर्षगुप्त की स्मृति में बनवाया गया था।
  • 17.सिरपुर स्थित ईंटों से निर्मित लक्ष्मण मंदिर के प्रकोष्ठ में निर्मित यह अद्भूत ईंष्टिका कलाकृति जिसमें ईंटों से द्वार बनाया गया है, जिसमें किवाड़, चैखट आदि कोमल ईंटों को तराश कर बनाया गया हैं। इसी कारण इसे ईंटो का ताजमहल कहा जाता हैं। आठवीं शताब्दी का यह लक्ष्मण मंदिर पूरे देश में ईंट की अद्भूत कलाकृति के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • 18.सिरपुर का प्रसिद्ध ईंटों से निर्मित लक्ष्मण मंदिर वास्तुकला प्रदर्शित हैं। शिल्पी द्वारा ईंटों से निर्मित इस मंदिर को हल्के कोमल हाथों से ईंट को तराश कर पच्चीकारी की गई है, जो इस मंदिर वास्तुकला सुन्दर ही नहीं, अपितु अप्रतिम बनाती हैं।
  • 19.सिरपुर उत्खनन से प्राप्त प्राचीन मुखलिंग शिव की प्रतिमा हैं। इस प्रतिमा मंे लिंग के चारों ओर देवी की आकृति उत्कीर्ण की गई हैं। इस प्रकार के दुर्लभ प्रतिमा अन्यत्र कहीं नहीं मिलती। यह सिरपुर संग्रहालय में संग्रहित हैं। आठवीं शताब्दी की प्राचीन प्रतिमा मानी जाती हैं।
  • 20.छत्तीसगढ़ में रामवनगमन शोधदल द्वारा वानस्पतिक अध्ययन करने पर ज्ञात हुआ कि शिवरीनारायण में मुख्य मंदिर के पास प्राचीन वट वृक्ष हैं। यह वट वृक्ष के पत्ते दोने के आकार के निकलते हैं। इस संबंध में जनश्रुति है कि प्रभु श्रीराम यहाँ पर माता शबरी से भेंट हुई थी। माता शबरी ने इसी वृक्ष के पत्तल में प्रभु श्रीराम को बेर खिलाये थे। तब से यह वृक्ष के पत्ते भी दोने के आकार लेने लगा। यह भारत में एक दुर्लभ वृक्ष के रूप में प्रसिद्ध हैं।
  • 21 छत्तीसगढ़ में रामवनगमन शोधदल द्वारा वानस्पतिक अध्ययन के दौरान दंतेवाड़ा में माँ दंतेश्वरी मंदिर के पास कुछ ही दूरी पर संखिनी- डंकिनी नदी के संगम के पास भैरव बाबा का मंदिर हैं। इसी मंदिर के पास के जंगल में एक बेल का दुर्लभ वृक्ष है। इस वृक्ष की विशेषता है कि इसमें 12-15 दल वाले पत्ते निकलते हैं। इस प्रकार का दुर्लभ बेल का वृक्ष अन्यत्र कहीं नहीं मिलता। कहा जाता है प्रभु श्रीराम जब वनगमन करते समय इस क्षेत्र में पहुँचे थे, तब उन्होंने बेल पत्ते अपने ईष्ट देव अर्थात् शिवजी को अर्पित कर अभिषेक किया था। अतः उसी प्राचीन बेल वृक्ष की यह प्रजाति है, जिसमें 12-15 दल वाले दुर्लभ पत्ते इस वृक्ष में मिलते हैं।
  • 22 कांकेर के पास महानदी के डुबान में देवखूँट नामक स्थान हैं। इस स्थान पर प्राचीन शिव मंदिर एवं पुरावशेष बिखरे पड़े हैं। कहा जाता है कि अंग्रेज इतिहास का वेगलर ने सर्वप्रथम इस मंदिर के शिखर को डुबान से देखा था। उसके बाद से यह मंदिर अनन्त काल तक जल प्लावित हो गया। वर्ष 2002 में भीषण अकाल पड़ने पर जल से बाहर निकल आया था। उसके बाद पुनः जल प्लावित हो गया। इसका दुर्लभ चित्र लेखक के कैमरे में कैद हो गया।
  • 23.छत्तीसगढ़ में ईंट के प्राचीन मंदिरों में सिद्धेश्वर शिव मंदिर पलारी एक प्रसिद्ध प्राचीन मंदिर हैं। ईंटों से निर्मित यह मंदिर उत्कृष्ट ईष्टिका कलाकृति का अनुपम उदाहरण हैं। 8-9वीं शताब्दी का यह मंदिर छत्तीसगढ़ में उत्कृष्ट कलाकृति के कारण प्रसिद्ध हैं।
  • 24. रामायण कालीन बस्तर - डॉ. हेमू यदु रामवनगमन शोध संस्थान छत्तीसगढ़ के शोधदल के तत्वाधान में दिनांक 12, 13 एवं 14 नवम्बर 2012 को तीन दिवसीय बस्तर का भ्रमण किया गया। बस्तर क्षेत्र का शोधपरक अध्ययन करने पर शोधदल के सामने कुछ नए तथ्य उजागर हुए हैं, जो बस्तर को रामायण काल से जोड़ती है। छत्तीसगढ़, जिसका प्राचीन नाम दक्षिण कोसल है। रामायण काल में यह भू-भाग दण्डकारण्य के नाम से प्रसिद्ध था। उत्तर से दक्षिण को जोड़ने वाले इस भू-भाग का वैदिक नाम दक्षिणापथ भी मिलता है। इस प्रकार बस्तर हर युग में अलग-अलग नाम से चिन्हित किया जाता रहा। बस्तर आदिवासी बहुल क्षेत्र है, यहाँ की आदिम संस्कृति आज भी तत्कालीन रामायण कालीन युग का स्मरण कराती है। दूरस्थ क्षेत्र में कुछ ऐसे मानव आज भी विद्यमान है, जो पूँछ वाले है। ये बस्तर की वानर संस्कृति के परिचायक है। इस संबंध में शोधदल को एक दुर्लभ छायाचित्र भी उपलब्ध कराया गया, जिसमें एक बालक पूँछ के साथ दिखाया गया है। संलग्न छायाचित्र। इसी प्रकार रक्ष संस्कृति के पोषक के रूप में बस्तर के आदिवासियों के दूरस्थ ग्रामों में कुछ ऐसे मानव भी मिले हैं, जिनके सिर पर सिंग होते हैं। इस प्रकार यह बस्तर का भू-भाग एक प्राचीन संस्कृति का परिचायक है। बस्तर का नर्तक दल आज भी सिंग को सिर पर लगाकर नृत्य करता है, जो उनकी प्राचीन सभ्यता (रक्ष संस्कृति) का परिचायक है। इस क्षेत्र की अभी भी ‘‘मानव विज्ञान/नृतत्व शास्त्र’’ पर शोध किया जाना आवश्यक है। इस शोध से इस क्षेत्र की प्राचीन संस्कृति उजागर होगी। रामायण कालीन कुछ ऐसी घटनाएँ जिनका आधार यहाँ की दंतकथाएँ, किंवदंतियाँ एवं जनश्रुतियाँ रही है। उन्हें स्थापित करने का तत्कालीन युग के संवाहकों ने प्रयास किया था। फलस्वरूप आज एक ऐतिहासिक धरोहर के रूप में विद्यमान है, जिसका संक्षिप्त में विवरण निम्नानुसार है:-)
  • 25. जटायुशिला बस्तर क्षेत्र रामायण काल में रक्ष संस्कृति से प्रभावित क्षेत्र माना जाता था। यहाँ रक्ष संस्कृति के पोषण लंकापति रावण का वर्चस्व था। बस्तर क्षेत्र में शोधदल द्वारा श्रीराम से संबंधित वनवास काल की घटनाओं के संबंध में अध्ययन करने पर ज्ञात हुआ कि कोण्डागाँव जिले के अंतर्गत फरसगाँव के पास बोरगाँव स्थित एक छोटा-सा ग्राम है, जो राष्ट्रीय राजमार्ग-43 के दाहिनी ओर स्थित है। इसी गाँव के करीब 02 कि.मी. की दूरी पर सघन वनों के मध्य एक ऊँचे स्थान पर विशाल शिला रखा हुआ है। इस शिला को जटायुशिला कहा जाता है, जो वनगमन मार्ग में आता है। भगवान श्रीराम से जटायु की पहली मुलाकात इसी शिला में हुई थी। जटायु को देखकर लक्ष्मण ने सोचा था कि कुछ छद्म वेश में राक्षस है, जो पक्षी के रूप में है। उसे देखते ही लक्ष्मण ने तीर-कमान को संभाल लिया। प्रभु श्रीराम ने पहचान लिया था कि उन्होंने मुस्कुराते हुए रूकने का इशारा किया था। तब पक्षीराज जटायु शिला से उतरकर उन्हें अपना परिचय दिया था कि वे राजा दशरथ के मित्र है। 30-40 फीट की ऊँचाई पर यह शिला स्थित है, जहाँ पर जटायु विराजमान हुआ करते थे। उनकी स्मृति में श्रद्धालु इस शिला का नमन करने के लिए वर्ष में एक बार यहाँ मेला भरता है। यहीं पर भैरव बाबा का छोटा मंदिर है। भैरव बाबा का यह मंदिर मेला का प्रमुख आकर्षण का केन्द्र होता है। इस प्रकार दण्डकारण्य क्षेत्र में प्रचलित जनश्रुति, जनकथाएँ इस शिला को जटायुशिला के रूप में स्थापित करती है। शोधदल ने इस क्षेत्र का भौगोलिक अध्ययन किया, तो इस तथ्य को प्रमाणित पाया है कि वनगमन मार्ग में जटायुशिला घटित रामायण कालीन घटनाओं का एक महत्वपूर्ण साक्ष्य है। वरण निम्नानुसार है:-)
  • 26. सूर्पणखा देवी वाल्मीकि रामायण में रावण की बहन सूर्पणखा का उल्लेख मिलता है। सूर्पणखा का दण्डकारण्य क्षेत्र में राज्य होने की जनकथा बस्तर क्षेत्र में प्रसिद्ध है। सूर्पणखा को यहाँ देवी के रूप में मान्यता दी गई है। बस्तर क्षेत्र में कोण्डागाँव जिले के अंतर्गत फरसगाँव से कुछ ही दूरी पर मुख्य मार्ग राष्ट्रीय राजमार्ग-43 के दाहिनी ओर बड़ेडोंगर जाने वाला सहायक मार्ग है। इसी मार्ग में लगभग 08 कि.मी. की दूरी पर आलोर नामक एक छोटी-सी पहाड़ी है। इस पहाड़ी पर बड़े-बड़े शिलाखण्ड रखे हुए हैं। इस शिलाखण्ड के मध्य में एक अनगढ़ प्रतिमा स्थापित है। ग्रामवासी इसे देवी मानकर पूजा करते हैं। प्रचलित जनकथा एवं जनश्रुतियों में इसे सूर्पणखा देवी कहा जाता है। इसकी पूजा वर्ष में एक बार दशहरा के दूसरे दिन करने की परम्परा है। जैसा कि दशहरा के पूर्व जहाँ 09 दिन दुर्गा की पूजा होती है। वहीं 10वें दिन दशहरा पर्व रावणवध कर मनाया जाता हेै अर्थात् दशहरे के दूसरे दिन इस देवी की बड़े धूमधाम एवं विधि विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। इस मंदिर का वर्ष में एक ही बार पूजा होना एक रहस्य को जन्म देती है। ग्रामवासियों का कहना है कि यह माता सूर्पणखा का क्षेत्र है। सूर्पणखा को रावण द्वारा यह भू-भाग दिया गया था। यहाँ पर उसका ही राज्य था। केसकाल से लेकर कोण्डागाँव तक उसका प्रभाव क्षेत्र माना जाता है। केशकाल का अर्थात् यहाँ जन्म एवं मृत्यु के बीच केवल केश (एक बाल के बराबर) का ही अन्तर होता है, जिसमें काल ज्यादा प्रभावशाली होता है। बस्तर क्षेत्र की ऐसी केशकाल की घाटी जो कभी इतनी दुर्गम थी कि यहाँ से गुजरने वाला शायद ही जीवित बच पाता था। दण्डकारण्य में बस्तर का प्रवेश द्वारा केशकाल की घाटी को माना जाता है। केशकाल आज भी आततायियों (माओवादी) के प्रभाव क्षेत्र में आता है। रामायण काल में इस धरा की क्या भूमिका होगी यह स्पष्ट है। अतः सूर्पणखा को यहाँ देवी के रूप में मान्यता दिया जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं। वर्तमान में अब इसके नाम का स्वरूप परिवर्तित हो गया है। इसे लिंगेश्वरी देवी भी कहते हैं। दूर-दूर से ग्रामवासी बच्चे की मनौती लेकर आते हैं। मनौती मानने वाली महिला को इस मंदिर का पुजारी (बैगा) द्वारा एक ककड़ी में चिरा लगाकर खाने के लिए दिया जाता है। ककड़ी को खाने के बाद महिला प्रसुती योग्य हो जाती है, ऐसी लोकमान्यता है।
  • 27. पंचाप्सर तीर्थ - माण्डकर्णी आश्रम वाल्मीकि रामायण में पंचाप्सर तीर्थ का उल्लेख मिलता है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रीराम वन प्रवास के अवधि में दण्डक के रमणीय दृश्यों ने प्रभावित किया है। उन्होंने यहाँ के पर्वत, शिखरों, प्रवाहित वेगवती नदियों, वनों और उनमें निवास करने वाले बड़े सींग के भैंस, मतवाले हाथियों और सूअर के समूह को देखा था। नदियों के किनारे सारस, चक्रवाक और जल पक्षियों से युक्त थे। सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम से निकलकर सीता के चित में उठी आशंका का समाधान संपूर्ण दिवस चलकर सूर्यास्त की बेला में वे पंचाप्सर नामक एक योजन लंबे-चौड़े सरोवर के निकट पहुँचे, जो कमलों, सर्पों, चलचारी, पक्षियों, राजहंसों, कमलहंसों और सारस से पूर्ण था। हाथियों के समूह उस तड़ाग के आसपास ही विचरण कर रहे थे। तड़ाग से गीतों और वादियों की सुमधुर ध्वनि आ रही थी, किन्तु कोई दिखाई नहीं दे रहा था। ऐसे अद्भूत दृश्य को देखकर श्रीराम ने साथ आये तपस्वियों से उस तड़ाग का वृत्तान्त पूछा। धर्मात्मा तपस्वियों ने उन्हें बताया कि यह माण्डकर्णी ऋषि का आश्रम है और यह पानी से सैदव भरा रहने वाला है। पंचाप्सर नामक तड़ाग केवल जल और वायु का सेवन कर माण्डकर्णी ऋषि ने 10,000 वर्षों तक कठोर तपस्या कर इंद्र, अग्नि आदि देवताओं को भयभीत कर दिया है। उनके तप को खंडित करने के उद्देश्य से देवताओं ने विद्युत की आभा रखने वाले पाँच अप्सराओं को भेजा था, जिन्होंने परम योगी को अपने काम के अधीन किया। माण्डकर्णी ऋषि ने इन अप्सराओं से प्रभावित होकर पाँचों अप्सराओं को पत्नी के रूप में स्वीकार कर पंचाप्सर सरोवर के मध्य में निवास बना लिया था और इन अप्सराओं के साथ राग-रंग में रत रहने लगे। राग-रंग में रत इनकी क्रीड़ाओं से गीत-संगीत की ध्वनि से पूरा वातावरण गूंज उठता था। इसी प्रसंग को लेकर बस्तर क्षेत्र में यह पंचाप्सर तीर्थ नामक स्थान माण्डकर्णी नदी के तट पर स्थापित है। भगवान श्रीराम जब वनगमन करते समय यहाँ से गुजरे थे, तो उन्हें संगीत का स्वर सुनाई दिया था। तब इस स्थान के संबंध में जानकारी चाही, तो उन्हें बताया गया कि यहाँ माण्डकर्णी ऋषि का आश्रम है। वे जल के भीतर महल बनाकर रहते हैं। यहाँ पाँच अप्सराएँ उनकी सेवारत हैं। तब श्रीराम ने इस ऋषि से मिलना उचित नहीं समझा और आगे बढ़ गए थे। इसी प्रसंग के रूप में बस्तर के भानपुरी ग्राम से 07 कि.मी. की दूरी पर चपका ग्राम है। यह ग्राम माण्डकर्णी नदी के तट पर बसा है। कहा जाता है कि नदी के तट पर माण्डकर्णी ऋषि का आश्रम था। इसी कारण इस नदी का नाम माण्डकर्णी पड़ा। यहाँ पर स्थापित माण्डकर्णी ऋषि का आश्रम प्राकृतिक सुन्दरताओं से परिपूर्ण है। आश्रम के पास नदी की पाँच धाराएँ एक कुण्ड में प्रवाहित होती है। इसे पाँच अप्सराओं का स्वरूप माना जाता है। इन धाराओं को रिदम आज भी कर्ण प्रिय है। ऐसा अनुभव होता है कि जल के भीतर कोई नृत्य-संगीत कर रहा है। बस्तर जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्र में माण्डकर्णी ऋषि का आश्रम, नदी का नाम माण्डकर्णी होना इस तथ्य को निरूपित करता है। रामायण कालीन जनकथाएँ आज भी बस्तर में श्रीरामवनगमन मार्ग की पुष्टि करता है। शोधदल का यह एक शोधपूर्ण कार्य था, जो छत्तीसगढ़ के रामायण काललोकमान्यता है।
  • 28 .राजा दण्ड की राजधानी मधुपुरी (मधोता) वाल्मीकि रामायण में राजा दण्ड की राजधानी मधुपुरी को बताया गया है। मधुपुरी अर्थात् महुआ जिसे बस्तर क्षेत्र में मधु कहा जाता है। इस महुआ वृक्ष का सघन वन से आच्छादित मधुपुरी नामक स्थान जो आज ग्राम मधोता के नाम से प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि यह मधोता क्षेत्र कभी राजा दण्ड की राजधानी मधुपुरी थी। राजा मधुमंत ने मधुपुरी को राजधानी बनाया था। राजा मधुमंत के नाम से राजधानी का नाम मधुपुरी पड़ा। कालान्तर मंे जब राजा दण्ड ने दक्षिण कोसल में अपने राज्य का विस्तार किया था। तब राजा मधुमंत से यह राज्य हस्तगत कर लिया था। यही मधुपुरी आज ग्राम मधोता के नाम से प्रसिद्ध है। नारंगी नदी के तट पर बसा यह ग्राम मधोता में प्राचीन शिव मंदिर है। इस मंदिर में स्थापित अनुग्रह प्राचीन शिवलिंग की है। ग्राम मधोता नारायणपाल से लगभग 08 कि.मी. की दूरी पर ग्राम बोदरा से होकर लगभग 08 कि.मी. कच्ची सड़क से भी पहुँचा जा सकता है। इस प्रकार रामवनगमन शोधदल ने मधुपुरी जो रामायण कालीन घटनाओं का साक्षी है। ऐसे स्थान को खोज कर इसे वनगमन म की पुष्टि की है।
  • 29. ग्राम ताडुकी - ताड़कासुर रक्ष संस्कृति के प्रभावशाली राक्षसों में ताड़कासुर का नाम आता है। नारायणपुर-अंतागढ़ मार्ग पर 20 कि.मी. पर ग्राम ताडुकी है। कहा जाता है कि यह ताड़कासुर का यह क्षेत्र था। यहीं पर भगवान श्रीराम से ताड़कासुर का युद्ध हुआ है। यहाँ पर ताड़कासुर गुफा भी है। प्रभु श्रीराम ताड़कासुर वध के बाद आगे बढ़े थे, तो उन पर राक्षसों का एक समूह ने आक्रमण किया था। उन्हें जानकारी मिली कि ताड़कासुर का वध हो गया है। यह समाचार सुनकर, क्रोधित होकर राक्षसों के समूह ने श्री सीताराम पर आक्रमण कर दिया था। तब प्रभु श्रीराम एवं लक्ष्मण ने अपनी वीरता का परिचय देते हुए राक्षसों का संहार कर दिया और वह इतने विशाल रूप में हुआ कि पहाड़ी जैसा हो गया। इस स्थान में राक्षसों की हड्डी का ढेर होने के कारण इसे राकसहाड़ा कहा जाता है। आज भी फॉसल्स को अग्नि में डालने से एक विशेष प्रकार की दुर्गंध आती है। यहाँ फॉसल्स के रूप में चट्टान है, जिसको जलाने से शरीर की दुर्गंध आती है। यह स्थान आज भी राकसहाड़ा के नाम से विख्यात है। वहीं पर रक्शाडोंगरी नामक स्थान भी है (ताड़का नामक दूसरे किसी राक्षस का यह क्षेत्र था)। बस्तर क्षेत्र में प्रभु श्रीराम राक्षसों का संहार कर शांति स्थापित कर रहे थे। इसके बाद नारायणपुर से छोटे डोंगर पहुँचे, छोटे डोंगर में प्राचीन शिव मंदिर के भग्नावशेष मिले हैं। छोटे डोंगर से होकर प्राचीन काल में बाणासुर की राजधानी बारसूर पहुँचे।
  • 30. बाणासुर की राजधानी - बारसूर बस्तर क्षेत्र में रक्ष संस्कृति के संरक्षक के रूप में बाणासुर राक्षस का नाम आता है। बाणासुर का एक छत्र साम्राज्य था। उसका आतंक पूरे क्षेत्र में था। कहा जाता है कि बाणासुर की राजधानी बारसूर थी। प्रभु श्रीराम इस क्षेत्र से होकर आगे वनगमन में गए थे। वर्तमान में बारसूर एक सांस्कृतिक एवं धार्मिक केन्द्र है। यहाँ प्रसिद्ध चंद्रादितेश्वर मंदिर, मामा-भांजा मंदिर, बत्तीसा मंदिर तथा विश्व प्रसिद्ध गणेश प्रतिमा स्थापित है। गणेश की यह विशालकाय दुर्लभ प्रतिमा छत्तीसगढ़ राज्य की अस्मिता है। मामा-भांजा मंदिर के संबंध में किंवदंती है कि मामा-भांजा का पवित्र संबंध त्रेतायुग से चला आ रहा है। बस्तर क्षेत्र के निवासी संबोधन में मामा का प्रयोग अधिक करते हैं। बारसूर से श्रीराम चित्रकोट पहुँचे। चित्रकोट जलप्रपात जो इन्द्रावती पर बना हुआ है। राम वनगमन के समय यह राम-सीता की रमणीय स्थली थी। यहाँ कुछ समय व्यतीत किए थे। इस राम-सीता की लीला स्थली भी कहा जाता है। सीता एवं रामचंद्र के नाम पर एक गुफा भी है एवं प्राचीन शिव मंदिर है। कहा जाता है कि भगवान राम से चित्रकोट में हिमगिरी पर्वत से भगवान शिव एवं पार्वती मिलने आए थे। चित्रकोट होकर तपस्वी श्रीराम नारायणपाल गए, जो इंद्रावती नदी के तट पर बसी प्राचीन नगरी है। यहाँ विष्णु एवं भद्रकाली की मंदिर है। नारायणपाल से दण्डकारण्य का प्रमुख केन्द्र जगदलपुर से होकर श्रीराम गीदम पहुँचे।
  • 31. गिद्धराज की राजधानी - गीदम गीदम के संबंध में किंवदंती है कि यह क्षेत्र गिद्धराज जटायु की नगरी थी। गिद्धराज राजा दशरथ के प्रिय मित्र थे। अनेक बार दोनों ने साथ-साथ युद्ध किया था। श्रीराम वनगमन के समय गिद्धराज से मिले थे। गिद्धराज के नाम से इस स्थान का नाम गीदम होने की पुष्टि होती है। रामकथा में उल्लेख मिलता है कि श्रीरामचंद्र जी की पर्णकुटी में निवास करने के पूर्व उनकी भेंट गिद्धराज से हुई थी, जो जटायु शिला के नाम से प्रसिद्ध है, जो फरसगाँव के पास है। यहाँ पास ही कालरी नामक स्थान है, इस स्थान के संबंध में जनश्रुति है कि रावण का पुष्पक विमान यहाँ उतरा था। इसी कारण से यहाँ की भूमि काली होकर बंजर हो गई है, जिसके कारण इसे कालरी कहा जाता है। गीदम से वे शंखनी एवं डंकनी नदी की तट पर बसा दंतेवाड़ा पहुँचे, जहाँ पर आदि शक्तिपीठ माँ दंतेश्वरी का प्रसिद्ध मंदिर है। इसी मंदिर के पीछे शंखनी-डंकनी नदी के संगम के पास भैरव बाबा का मंदिर है। इसी मंदिर परिसर के पास एक ऐसा बेल वृक्ष है, जिसमें 9-12 दल (पत्ते) मिले हैं। इस सबंध में किंवदंती है कि रामायण काल में यह बेल के वन के रूप में प्रसिद्ध था। भगवान श्रीराम वनगमन करते समय यहाँ पहुँचे थे। तब उन्होंने शिवजी (भैरव बाबा) का अभिषेक किया था। उस समय उन्होंने 12 दल वाले बेल पत्र चढ़ाकर पूजन किया थ। उस समय कई पेड़ इस प्रजाति के रहे होंगे, किन्तु वर्तमान में एक-दो दुर्लभ वृक्ष बेल के हैं, जिसमें 9 से 12 दल के पत्ते निकलते हैं। यह तथ्य भी वानस्पतिक प्रमाण का संकेत देता है। दंतेवाड़ा से श्रीराम कांगेर नदी के तट पर बसा तीरथगढ़ पहुँचे। तीरथगढ़ में सीता नहानी है। यहाँ पर राम-सीताजी की लीला एवं शिव पूजा की कथा प्रसिद्ध है। तीरथगढ़ एक दर्शनीय जलप्रपात है। इस मनोरम स्थल में कुछ समय व्यतीत करने के बाद श्रीराम, लक्ष्मण और सीता कोटूमसर पहुँचे, जिसे कोटि महेश्वर भी कहा जाता है। कोटूमसर का गुफा अत्यधिक सुंदर एवं मनमोहक है। कहा जाता है कि यहाँ वनवास काल के समय भगवान श्रीराम ने शिव की पूजा की थी। यहाँ प्राकृतिक अनेक शिवलिंग मिलते हैं। कुटुमसर से सुकमा होकर रामाराम पहुँचे। यह स्थान रामवनगमन मार्ग में होने के कारण पवित्र स्थान माना जाता है। यहाँ रामनवमी के समय का मेला पूरे अंचल में प्रसिद्ध है। रामाराम का चिट्मिट्टिन मंदिर प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि राम वनगमन के समय यहाँ राम ने भू-देवी (धरती देवी) की पूजा की थी। यहाँ की पहाड़ी पर श्रीराम के पद चिन्ह विद्यमान है। रामाराम से कोंटा पहुँचे। कोंटा से 8 कि.मी. उत्तर में शबरी नदी बहती है। माता शबरी का संबंध इस क्षेत्र से भी रहा है। माता शबरी की यह कर्म स्थली थी, जिसके नाम से शबरी नदी का नामकरण हुआ। इसी के तट पर बसा छोटा-सा ग्राम इंजरम में प्राचीन शिवमंदिर का भग्नावशेष है, जिसकी आज भी पूजा होती है। कहा जाता है कि भगवान श्रीराम ने यहाँ शिवलिंग की पूजा की थी। इन्जरम को स्थानीय बोली में ‘राम यहाँ आये थे’ होता है। अतः इस तथ्य की पुष्टि होती है कि पराक्रमी श्री राम इसी क्षेत्र से होकर दक्षिण मंे प्रवेश किए थे। शबरी नदी से होकर गोदावरी एवं शबरी के तट पर बसा, कोंटा से 40 कि.मी. दूर आंध्रप्रदेश की तटवर्ती क्षेत्र कोनावरम् पहुँचे। यहाँ पर शबरी नदी एवं गोदावरी नदी का संगम है। इस संगम स्थल के पास सीताराम स्वामी देव स्थान है। पर्णकुटी जाने के लिए कोंटा से शबरी नदी के तट पर से यहाँ राम-सीता वनवास काल में पहुँचे थे, जिसका उल्लेख वाल्मीकि रामायण में पंचवटी के रूप में मिलता है। इसके बाद गोदावरी नदी के तट पर बसा भद्राचलम पहुँचे। यहाँ पर ऋषि भद्र से मुलाकात एक ऊँचे पठार पर हुआ था, जहाँ ऋषि भद्र चलकर पहुँचे थे। इसी कारण इसका नाम भद्राचलम पड़ा। ऋषि भद्र ने प्रभु श्रीराम को बताया था कि आगे तालपेरू नदी एवं गोदावरी नदी संगम के पास अगस्त्य ऋषि का आश्रम है। प्रभु श्रीराम अगस्त्य से मिलने उनके आश्रम पहुँचे।
  • 32. छत्तीसगढ़ में कृष्ण गमन पथ के संबंध में शोध किया जावेगा - डॉ. हेमू यदु रायपुर । छत्तीसगढ़ में वाल्मीकि रामायण के संदर्भ में अब तक रामवनगमन के संबंध में शोध कार्य किया जा रहा है। वहीं अब छत्तीसगढ़ के इतिहासकार विद्वतजनों से परामर्श एवं सहयोग लेकर, महर्षि वेदव्यास कृति ‘‘महाभारत’’ के संदर्भों में श्रीकृष्ण का छत्तीसगढ़ से संबंधों पर शोध कार्य किया जावेगा। पुरातत्वविद् डॉ. हेमू यदु ने बताया कि महाभारत काल में छत्तीसगढ़ का विशेष महत्व था। यह भू-भाग महाकान्तार क्षेत्र के नाम से विख्यात था। महाभारत कालीन घटनाएँ छत्तीसगढ़ में घटित हुई थी। उन घटनाओं एवं तथ्यों को पौराणिक ग्रंथों एवं किंवदंतियों के संदर्भ को लेकर इस पर एक शोध कार्य किया जावेगा। द्वापर युग में श्रीकृष्ण ने राजा रूक्म की बहन रूक्मणी का हरण करने के लिए द्वारिका से विदर्भ आए थे। उन दिन विदर्भ का शासक राजा रूक्म थे। उन दिनों सिरपुर के चेदिवंश के शासक शिशुपाल थे। शिशुपाल ने रूक्मणी हरण का तीव्र विरोध किया था। कृष्ण और शिशुपाल में युद्ध हुआ था। ज्ञातव्य हो कि विदर्भ उन दिनों छत्तीसगढ़ (दक्षिण कोसल) का भू-भाग था अर्थात् यह छत्तीसगढ़ के अंतर्गत माना जाता था। कालान्तर में विदर्भ छत्तीसगढ़ से अलग हो गया। डॉ. हेमू यदु ने बताया कि महाभारत कालीन घटनाओं में राजा मोरध्वज की दानवीरता का उल्लेख मिलता है। राजा मोरध्वज का संबंध छत्तीसगढ़ के आरंग से होने की ऐतिहासिकता एवं किंवदंतियाँ प्रबल है। अतएव राजा मोरध्वज को दानवीरता की परीक्षा लेने के लिए भगवान श्रीकृष्ण का अर्जुन के साथ आरंग के आगमन की कथा मिलती है, जहाँ पर राजा मोरध्वज ने अपने पुत्र के शरीर को आरे से दो टुकड़े करने का प्रसंग आता है। अतः इन ऐतिहासिक तथ्यों पर शोध किया जाना आवश्यक है। तब ही छत्तीसगढ़ में महाभारत की घटनाओं को स्थापित किया जा सके। महासमुंद जिले के अंतर्गत सिरपुर प्रचलित जनश्रुतियों एवं जनमान्यताओं के अनुसार महाभारत कालीन में चित्रांगदपुर था। यहाँ चित्रवाहन नामक राजा राज्य करता था, जिसकी पुत्री का नाम चित्रांगदा था। उनसे एक पुत्र हुआ था, जिसका नाम वभ्रुवाहन था। राजा वभ्रुवाहन महाभारत काल के चेदिवंश के सुविख्यात परम शूरवीर शासक के रूप में प्रख्यात था। पाण्डववंशी इस वभु्रवाहन की राजधानी मणिपुर थी। मणिपुर, सिरपुर का महाभारत कालीन नाम होने की जानकारी जनश्रुतियों से होती है। इस प्रकार महाभारत काल में महाभारत का अर्जुन का संबंध सिरपुर से होने के तथ्य मिलते हैं। महाभारत के अनुसार चेदिवंश के शासक शिशुपाल एक अति शक्तिशाली शासक था। चेदि राजा शिशुपाल की सगाई विदर्भ के राजा रूक्म की बहन रूक्मणी से हुई थी। राजा शिशुपाल ने रूक्मणी हरण के समय श्रीकृष्ण का तीव्र विरोध किया था। कृष्ण और शिशुपाल का युद्ध हुआ था, जिसमें शिशुपाल परास्त हुए थे। शिशुपाल की राजधानी सिरपुर थी एवं सराईपाली क्षेत्र में आज भी पर्वत का नाम शिशुपाल पर्वत मिलता है। यह पर्वत शिशुपाल के भू-भाग होने के कारण इस पर्वत का नाम शिशुपाल पर्वत कहा
  • 33. खारुन नदी की तरी घाटी सभ्यता का रहस्योद्घाटन - डॉ. हेमू यदु छत्तीसगढ़ को नदी संस्कृतियों की धरा कही जाती है। इस पावन धरा में सहस्त्राब्दियों का इतिहास विद्यमान है। हिमालय से प्राचीन, विन्ध्याचल पर्वत का दक्षिण भाग दक्षिण कोसल, छत्तीसगढ़ का प्राचीन नाम है, जहाँ मानव सभ्यता का विकास, प्रागैतिहासिक काल के प्रमाण गुफाओं एवं कन्दराओं में आज भी विद्यमान है। इस भौगोलिक परिवेश में महानदी जिसका पौराणिक नाम चित्रोत्पला मिलता है। वहीं प्राचीन खारुन नदी जिसका प्राचीन नाम पुराणों में ‘‘क्रमा’’, ‘‘क्रमात’’, ‘‘कूर्म’’ अथवा ‘‘कूर्मा’’ मिलता है। इसी शब्द का अपभ्रंश कालांतर में कूर्म से खूर्म और खूर्म से खारुन के रूप में परिवर्तित हो गया। यदि इसका शाब्दिक अर्थ देखे, तो कूर्म अर्थात् कच्छप जिसे प्राचीन ग्रंथों में पृथ्वी का भार साधक कहा गया है। इसकी चाल अत्यन्त धीमी होती है। यही कारण है कि खारून नदी अपने नाम के अनुरूप एक उछलती-कूदती नदी न होकर शांत एवं धीमी गति से प्रवाहित होने वाली नदी है। यही कारण है कि इस नदी की शांत और धीमी होने के कारण मानव जीवन को अतएव इस नदी के तट पर अनेक संस्कृतियों का उद्गम, विकास एवं विनाश शताब्दियों से होता रहा है। इसी श्रृंखला में तरी घाटी एक महत्वपूर्ण संस्कृतियों एवं सभ्यताओं का उदाहरण बनकर रहस्योद्घाटन करती है। पुरातत्वविद् डॉ. हेमू यदु ने खारुन नदी की तरी घाटी सभ्यता के संबंध में प्रकाश डालते हुए बताया कि छत्तीसगढ़ की प्राचीन नदियों में खारुन नदी भी एक प्रमुख नदी मानी जाती थी, जो दुर्ग जिले को तांदुला जलाशय से उद्गमित होती है। इसी के तट पर नदी घाटी की सभ्यता पर रहस्योद्घाटित करते हुए उन्होंने बताया कि खारुन नदी के तट पर प्राचीन सभ्यता एवं प्राचीन मानव संस्कृति का उद्भव एवं विकास हुआ, चूँकि यह घाटी नीचे की तरफ होने अर्थात् उथली होने के कारण इसे तरी जैसा कि छत्तीसगढ़ी में तरी का आशय नीचे के हिस्से को संबोधित किया जाता है। तरी घाट में परत-दर-परत विभिन्न संस्कृतियों के पुरावशेष उत्खनन से प्रकाशमान हो रहे हैं। छत्तीसगढ़ी बोली में ‘‘तरी’’ नीचे के हिस्से को कहा जाता है। तरी घाटी अर्थात् नीचे का भू-भाग। तरी घाटी प्राकृतिक प्रकोप से अर्थात् बाढ़ से जलप्लावित होकर पूरी सभ्यता नष्ट हो गई होगी। पूर्व में इस स्थान का नाम कुछ और रहा होगा, जो एक प्राचीन नगरी के रूप में स्थापित था। यह भू-भाग प्राकृतिक प्रकोप से नीचे दबने के कारण इसे लोगों ने तरी में होने के कारण इस स्थान का नाम ‘‘तरी घाटी’’ रख दिया। डॉ. हेमू यदु ने बताया कि खारुन नदी का तरी घाटी एक उथला भू-भाग था, जहाँ नदी बंदरगाह के मिलने की यहाँ संभावना है। यह स्थान प्राचीन काल में व्यापार का प्रमुख केन्द्र रहा होगा। खारुन से महानदी होकर सिरपुर तक नदी मार्ग से व्यापार हुआ करता। इसके प्रमाण कुषाण कालीन प्राचीन स्वर्ण मुद्राओं की प्राप्ति इसकी पुष्टि करती है। तरी घाटी में अब तक मिले अवशेषों में मिट्टी के बर्तन, लोहे के औजार तथा मनके एवं आभूषणों की प्राप्ति इस तथ्य की ओर इंगित करती है। एक प्राचीन सभ्यता हजारों साल पहले यहाँ विकसित थी एवं प्रागैतिहासिक काल से लेकर मध्य युगीन काल तक इसका अस्तित्व रहा होगा। कालांतर में यह तरी घाटी प्राकृतिक प्रकोप बाढ़ आदि से जलप्लावित हो गई और पूरी की पूरी सभ्यता नष्ट हो गई। अब पुरातात्विक अन्वेषण से यह तथ्य अब प्रमाणित होने जा रहा है। छत्तीसगढ़ की प्राचीन सभ्यता जहाँ आदिमानव की उत्पत्ति, विकास की गाथा कह रही है। खारुन नदी व्यापार का केन्द्र ही नहीं, अपितु आवागमन का साधन भी हुआ करता था। जलमार्ग में इसका विशेष महत्व था। छत्तीसगढ़ का पुरातत्व विभाग के प्रयासों से अब वह दिन दूर नहीं कि खारुन नदी की तरी घाटी एक नए रहस्यों को जन्म देगी और छत्तीसगढ़ के इतिहास को एक नदी दिशा मिलेगी। डॉ. हेमू यदु ने बताया कि खारुन नदी एक पौराणिक नदी है। अब तक के मिले अवशेषों से यह प्रमाणित होने जा रहा है कि रायपुर की जीवनदायिनी खारुन नदी के तट पर अनेक प्राचीन सभ्यता विकसित थी, जो देश के प्राचीन सभ्यताओं के समकालीन रही होगी। तरी घाटी के उत्खनन से अभी और नए रहस्यों को उद्घाटित करेगी और छत्तीसगढ़ का गौरवशाली इतिहास प्रकाशमान होगा। मोहनजोदड़ो, हडप्पा लोथल की प्राचीन सभ्यताओं का प्रतिबिम्ब तरी घाटी की सभ्यता में परिलक्षित होती है। तरी घाटी भी अब एक विकसित प्राचीन नगर सभ्यता को उद्घाटित करेगी, ऐसी संभावना है।
  • 34. दंतेवाड़ा में ढोलकल की पहाड़ी पर मिली ‘‘एकदंत की दुर्लभ’’ विशाल प्रतिमा (बारसूर की गणेश प्रतिमा से कलात्मक प्रतिमा) ‘प्रथम देव पूज्यते’ के रूप में स्थापित गणपति की अनेक प्रतिमाएँ छत्तीसगढ़ के विभिन्न अंचलों में मिली है, किन्तु दंतेवाड़ा जिले में स्थित ढोलकल की पहाड़ी की चोटी पर स्थापित गणपति की विशाल प्रतिमा पुरातात्विक सर्वेक्षण से प्रकाश में आया है। 6 फीट ऊँची विशाल गणपति की प्रतिमा अंचल में कौतुहल का विषय बनी हुई है। पुरातत्वविद् डॉ. हेमू यदु ने पुरातात्विक सर्वेक्षण कर यह जानकारी दी कि दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय से 15 कि.मी. दूर ग्राम परसपाल से कोतवालपारा होकर ग्राम जंगपारा, जंगपारा से 30 कि.मी. दूरी पर ग्राम ढोलकल है। इसी ढोलकल ग्राम में 300 मीटर ऊँची पहाड़ी की चोटी पर यह दुर्लभ विशालकाय गणपति की प्रतिमा स्थपित है। इस प्रतिमा का प्रतिमा वैज्ञानिक अध्ययन से इसे एकदंत गणपति कहा जा सकता है। डॉ. हेमू यदु ने बताया कि 6 फीट ऊँची 21/2 फीट चौड़ी ग्रेनाईट पत्थर से निर्मित यह प्रतिमा वास्तुकला की दृष्टि से अत्यन्त कलात्मक है। गणपति की इस प्रतिमा में ऊपरी दांये हाथ में परशु, ऊपरी बांये हाथ में टूटा हुआ एक दंत, नीचे दांये हाथ में अभय मुद्रा में अक्षमाला धारण किए हुए तथा नीचे बांये हाथ में मोदक धारण किए हुए आयुध के रूप में अलंकृत है। पर्यंकासन मुद्रा में बैठे हुए गणपति का सूँड बायीं ओर घूमती हुई शिल्पांकित है तथा उदर में सर्प लपेटे हुए तथा संकल को जनेऊ के रूप में धारण किए हुए है। गणपति की जनेऊ के रूप में शंकल धारण किया जाना प्रतिमा विज्ञान में कहीं नहीं मिलता, यही कारण है कि यह एक दुर्लभ प्रतिमा है। इस प्रतिमा में पैर एवं हाथों में कंकण आभूषण के रूप में शिल्पांकित है। वहीं इनके सिर पर धारित मुकुट भी सुंदर अलंकरणों से संज्जित है। इस प्रकार की प्रतिमा बस्तर क्षेत्र में अन्यत्र कहीं नहीं मिली है, बारसूर से गणपति की दो विशाल प्रतिमाएँ अवश्य मिली है, किन्तु इनमें अलंकरण का अभाव है। इस प्रकार ढोलकल की प्रतिमा के अलंकरण एवं उसकी मूर्तिशिल्प में दक्षिण की कला का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार गणेश जी को गणपति अर्थात् गणों के अधिपति कहा गया है। पौराणिक कथा के अनुसार गणेश जी का परशुराम से युद्ध हुआ था। कहा जाता है कि एक बार परशुराम जी शिवजी से मिलने कैलाश पर्वत गए। उस समय शिवजी विश्राम में थे। गणेश जी उनके रक्षक के रूप में विराजमान थे। उन्हें परशुराम को जाने से रोकने पर उन दोनों के बीच विवाद उत्पन्न हुआ एवं परशुराम क्रोधित होकर फरसा से उनका एक दांत काट दिए थे। तब से गणेश जी एकदंत कहलाए। शिवजी के शहस्त्र नामों में शिवजी का ‘दंतेश’ नाम भी मिलता है। शिवजी दंतेश की रक्तदंतिका देवी, दंतेश्वरी को शिव की शक्ति भी कहा गया है। दंतेश का क्षेत्र (वाड़ा) को दंतेवाड़ा कहा जाता है। इस क्षेत्र में कैलाश गुफा भी निहित है। इस संबंध में किंवदंती चली आ रही है कि यह कैलाश क्षेत्र जहाँ पर गणेश एवं परशुराम के मध्य युद्ध हुआ था। यही कारण है कि दंतेवाड़ा से ढोलकल पहुँचने के मार्ग पूर्व ग्राम परसपाल मिलता है, जो परशुराम के नाम से विदित है तथा इसके आगे ग्राम कोतवालपारा है। कोतवाल अर्थात् रक्षक के रूप में गणेश जी के क्षेत्र होने की जानकारी मिलती है। डॉ. हेमू यदु ने बताया इस विशाल प्रतिमा को दंतेवाड़ा क्षेत्र रक्षक के रूप में पहाड़ी के चोटी पर स्थापित किया गया प्रतीत होता है। गणेश जी के आयुध के रूप में फरसा इसकी पुष्टि करती है। चूँकि गणेश जी गणों के ईश, गणों के अधिपति थे। गाणपत्य सम्प्रदाय के प्रवर्तक थे। उन्हें देव और गण दोनों प्रिय थे अर्थात् सुर और असुर दोनों के प्रिय देवता माने जाते हैं। बाणासुर की राजधानी बारसूर में गणेश की प्रतिमा की उपलब्धि, रक्तदंतिका माँ दंतेश्वरी देवी की दंतेवाड़ा क्षेत्र में गणपति की उपलब्धि यह स्पष्ट संकेत देती है कि गणेश जी सर्वमान्य थे। उन्हें इस क्षेत्र में प्रमुख रक्षक के रूप में मान्यता थी। यहीं कारण है कि उन्हें नागवंशी शासकों ने इतनी ऊँची पहाड़ी पर स्थापित किया था। नागवंशी शासकों ने इस मूर्ति के निर्माण करते समय एक चिन्ह अवश्य मूर्ति पर अंकित कर दिया है। गणेश जी के उदर पर नाग का अंकन। गणेश जी अपना संतुलन बनाए रखे, इसीलिए शिल्पकार ने जनेऊ में संकल का उपयोग किया है। इस प्रतिमा की सूचना टाइम्स ऑफ इंडिया की संवाददाता सुश्री रश्मि जी से प्राप्त हुआ था, तत्पश्चात् स्थल का सर्वेक्षण किया गया। छत्तीसगढ़ की दंतेवाड़ा (बस्तर) क्षेत्र में एकदंत गणपति की यह एक दुर्लभ प्रतिमा है। कला की दृष्टि से 10-11 शताब्दी की (नागवंशी) प्रतिमा कही जा सकती है।
  • 35. रामायणकालीन वानस्पतिक शोध(श्रीरामवनगमन मार्ग छत्तीसगढ़ के सन्दर्भ मेें) रायपुर । छत्तीसगढ अस्मिता प्रतिष्ठान के तत्वाधान में छत्तीसगढ के अंचल का सधन दौरा कर प्रभु श्री राम के वन गमन मार्ग का शोध परक अध्ययन किया गया है । इसी सन्दर्भ में पुराविद डॉ0 हेमू यदु ने बताया कि धमतरी जिले में स्थित ग्राम मधुबन पहुॅच कर ,बाल्मिकी रामायण में उल्लेखित मधुबन की पुष्टि हेतु सर्वेक्षण किया गया । जैसा कि ज्ञातव्य है कि महुआ के वन को मधुवन कहा जाता है । रामायण काल की वानस्पतिक शोध कार्य का शुभारंभ मधुबन पहुॅच कर अस्मिता प्रतिष्ठान ने किया है । मधुबन लोमश ऋषि के आश्रम राजिम से 20 किलोमीटर दक्षिण पूर्व दिशा में महानदी के तट से 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक एैसा सुन्दर वन है जिसे प्रकृति का अनुपम देन कही जाती है यहॉ करीब 20 एकड़ में विस्तृत महुआ के सैकड़ो वर्ष प्राचीन वृक्ष है इस स्थान की भौगोलिक विशेषता है कि यहॉ एक ही प्रजाति के वृक्ष अर्थात महुआ का सधन वन है और महुआ को ही मधुवन कहा जाता है छत्तीसगढ के संभवतः एक ही स्थान में इतने सारे वृक्ष एक ही प्रजाति का उपादेयता इस तथ्य की पुष्टि करती है कि यह स्थान प्राचीन समय का मधुबन रहा होगा । नौ दल (नौ पत्तों) वाला बेल पत्र:- छत्तीसगढ़ की वनस्पतियों में एक ऐसा दुर्लभ बेल वृक्ष बस्तर के दन्तेवाड़ा के जंगल में पाया गया है जिसमें बेल वृक्ष में नौ से बारह दल (पत्ते)का प्राप्त होना इस अचंल की दुर्लभ वनस्पतियों में प्रमुख है ।इस संबंध में प्रचलित किवदन्ति है कि भगवान श्री राम वनवासकाल मेें दण्डकारण्य क्षेत्र में भ्रमण के दौरान दन्तेवाड़ा क्षेत्र में आये थे तब उन्होने शंखनी-दंखनी नदी के संगम स्थल में रेत से शिवलिग बनाकर उनका अभिषेक किया था तथा उस समय इष्टदेव शिवजी को बेलपत्र अर्पण किया था । उस बेल वृक्ष की एक प्रजाति आज भी वंशानुगत इस क्षेत्र में उपलव्ध है ।इस वृक्ष के बेल पत्र दलों की अधिकता के कारण उस समय दुर्लभ था और वह आज भी दुर्लभ है ।(देखे छाया चित्र)
  • 36. कटोरीनुमा वट वृक्ष के पत्ते:- छत्तीसगढ के वनस्पतिय भी अनेक रहस्यों का जन्म देती है । शिवरीनारायण क्षेत्र में एक ऐसा प्राचीन वट वृक्ष है जिसके पत्ते कटोरी नुमा निकलते है । यह वट वृक्ष आज भी शिवरीनारायण मंदिर के मुख्य मंदिर के समीप स्थित है इस दुर्लभ वट वृक्ष के संबंध में यह किवदन्ति प्रचलित है कि जब श्री राम दण्डकारण्य में भ्राता लक्ष्मण के साथ विचरण कर रहेे थे तब माता शबरी से उनके मतंग आश्रम में भेट हुई थी माता शबरी ने एकाएक श्रीराम को आश्रम में आते देख भाव विभोर हो उठी थी और वह पास में वट वृक्ष के पत्ते को दोना बनाकर उसमें खट्टे-मीटे बेर रखकर उन्हे चख कर प्रभु को अर्पित की थी कहा जाता है कि तब से इस वट वृक्ष में आज भी दुर्लभ प्रकृति का दोना आकार में पत्ते उगते है ।यह वृक्ष भी वंशानुगत है ।(छायाचित्र संलग्न है ) दर्भ(धास-कुश)ः- दर्भ अर्थात धास या कुश से कुशल एव कुशल से कोसल शव्द की उत्तति मानी जाती है । छत्तीगगढ का प्राचीन नाम कोसल अर्थात दक्षिण कोसल कहा जाता । इस नामकरण के पीछे कुश अर्थात दर्भ की अधिकता थी इसी कारण से इसे कुश क्षेत्र कहा जाता था । ठीक इसके विपरित जहॉ कुश अथवा धास उत्पन्न न हो ऐसे क्षेत्र का विदर्भ कहा जाता है ।छत्तीसगढ से लगा हुआ वह क्षेत्र जहॉ धास की बाहुल्यता नही थी इसी कारण से इसे विदर्भ की संज्ञा दी गयी ।विदर्भ वर्तमान मंे महाराष्ट् का भू-भाग है ।

    रामायणकालीन- भौगोलिक शोध पुराविद डॉ0हेमू यदु ने बताया कि छत्तीसगढ़ अस्मिता प्रतिष्ठान व्दारा इस स्थान को रामवन गमन से संबंध जोड़ते हुये आगे नगरी -सिहावा का भी दौरा कर पर्वतीय पौराणिकता पर शोध कार्य प्रारंभ किया गया ।रामायणकालीन भौगोलिक शोध कार्य में , सिहावा क्षेत्र में विस्तृत वैदिक कालीन सप्त ़ऋषि-मुनियो के नाम पर चिन्हित किये गये पहाड़ियो का भी सर्वेक्षण किया गया जिसमें सिहावा का श्रृंगि श्रृषि पर्वत, मुचकुन्द ़़़ऋषि के नाम पर मुचकुन्द पर्वत अर्थात मेचका पहाड़, कंक ़ऋषि के नाम पर केकरा डोंगरी, अंगिरा ़ऋषि के नाम पर रतावा पर्वत, बाल्मिकी आश्रम के नाम पर टांगरी डोगरी,अगस्त्य ़़़ऋषि के नाम पर हरदी भाटा में स्थित डोगरी

  • 37. बोधिसत्व नागार्जुन की ध्यान स्थली सिरपुर:ः बोधिसत्व नागार्जुन के संबंध में पूरे देश में नहीं विश्व में भी शोध हुये हैं तथा उनकी जीवनी के संबंध मंे भी विस्तृत शोध किया गया है। नागार्जुन छठवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में दक्षिण कोसल की राजधानी में निवास किया गया करते थे। उन दिनों सिरपुर बौद्ध धर्म का प्रमुख केन्द्र हुआ करता था जिसकी ख्याती इतनी अधिक थी की चीनी यात्री व्हेनसांग भी इससे प्रभावित होकर दक्षिण कोसल की यात्रा 639 सती. ई. में किये थे, और उन्होने अपनी यात्रा वृत्तांत में इसका उल्लेख किया था कि दक्षिण कोसल में सिरपुर 40 ली. तक विस्तुत था। अब तक के हुये सिरपुर के उत्खनन से प्रकाश में आयेबौद्ध विहार/संघाराम से इसकी पुष्टि होती है कि सिरपुर वही सिरपुर था जिसे देखने के लिये चीनी यात्री व्हेनसांग दक्षिण कोसल (छत्तीसगढ़) आये थे।
    सिरपुर में नागार्जुन एक रसायनविद् थे वे रसायन के क्षेत्र में पारंगत ही नहीं अपितु सिद्धता हासिल की थी कालांतर में वे बौद्ध धर्म से प्रभावित होकर उन्होने बौद्ध धर्म स्वीकार किया तथा सिरपुर में निवास रहकर उन्होने अध्ययन और अध्यापन दोनों कार्य उनके द्वारा संपन्न किया गया था। नागार्जुन अपनी अप्रतिम योग्यता से नालंदा जैसे विश्व प्रसिद्ध विश्वविद्यालय में आचार्य बनाये गये थे, जिसकी पुष्टि अनेक शोध ग्रंथों से प्राप्त होती है। 639 शती ई. में वैभवशाली सिरपुर के आकर्षण से प्रभावित होकर व्हेनसांग ने चीन से भारत की यात्रा करते हुये दक्षिण कोशल की राजधानी सिरपुर पहॅुचे थे। व्हेनसांग के साथ बुद्ध भिक्षुओं का दल भी सिरपुर आया था। वे सिरपुर में रहकर विभिन्न बौद्ध विहारों का दर्शन कर यहॉ ध्यान लगाये थे। सिरपुर में उन दिनों 100 संघाराम थे जिसमें बौद्ध भिक्षु और भिक्षुणियां निवासरत होकर तप एवं अध्ययन किया करते थे, 100 संघाराम में से 6-7 संघाराम उत्खनन से प्रकाश में आये है। जिसकी पुष्टि व्हेनसांग ने अपनी कृति ट्रेव्हल्स ऑफ यूआनचांग इन इंडिया में की थी । उन्होने बौद्ध विहार में रहने वाले बौद्ध भिक्षु एवं भिक्षुणियों के संबंध में भी लेख किया था कि उनकी संख्या लगभग 10,000 के आस-पास थी। सिरपुर बौद्ध धर्म का प्रमुख ध्यान केन्द्र था। यहॉ अध्ययन एवं अध्यापन दोनों हुआ करते थे जिनके प्रमुख रसायनविद् नागार्र्जुन थे, उन्होने पारा से सोना बनाने की विधि हासिल की थी तथा इन्होने अमृत निर्माण पर भी शोध किया था । जिसकी ख्याति पूरे विश्व में थी । नागार्जुन को इसी विद्वता के कारण बोधिसत्व की उपाधि से अलंकृत किया गया था।

    कालांतर में महानदी के मार्ग बदलने से जल प्लावित होकर सिरपुर नष्ट हो गया था। नागार्जुन की ध्यानस्थली अथवा तपोभूमि कहॉ थी इस संबंध में साक्ष्य नष्ट हो चुके है, और उनका अस्तित्व मिट्टी में दब चुका है। अतः विद्वानों द्वारा यह तर्क करना कि 5 मंजिली इमारत गुम्बद की खोज किया जाना चाहिये तथ्यहीन प्रतीत होता है। छ.ग. मंे दलाईलामा के आगमन एवं सिरपुर स्थित नागार्जुन गुफा में ध्यान करने के संबंध में विद्वानों के बीच मतभेद उभरकर सामने आया है वास्तविकता से यह कि सिरपुर नागार्जुन की ही नगरी थी छठवीं-सातवीं शताब्दी बौद्धों का प्रमुख केन्द्र था। अतः यहॉ की धरा जिसमें वन, पर्वत, गुफा जो भी सम्मिलित थे वे बौद्धों के अंतर्गत आते थे । इसलिये यह कहना उचित होगा कि पूरा सिरपुर उन दिनों बौद्धों को ध्यान केन्द्र रहा होगा । विस्तृत रूप से उत्खनन इन बौद्ध पुरावशेषों की ख्ुादाई से ही पूरे पुरावशेष के प्रकाश में आने पर ही इसकी पुष्टि की जा सकती है । व्हेनसांग ने अपनी यात्रा वृत्तंात में सिरपुर की दूरी के लिये 40 ली का उपयोग किया है ना कि 300 ली का । कुछ विद्ववान 300 ली बताकर दिग्भ्रमित कर रहे है। चीनी मानक के अनुसार 1 ली बराबर 500 मीटर अर्थात् 1/2 कि.मी. होता है इस प्रकार 40 ली का माप 20 कि.मी. होगा । इस प्रकार सिरपुर का क्षेत्रफल था 20 कि.मी. था जिसमें बौद्ध धर्म के संघाराम फैले हुए थे। अतः बोधिसत्व नागार्जुन किस स्थान पर ध्यान किये थे और कौन सी गुफा पर किये थे यह विवाद का विषय नहीं है। चूंकि सिरपुर में नागार्जुन निवास करते थे 20 कि.मी. के अंदर किसी भी स्थान पर ध्यान केन्द्र हो सकता है। वह किसी एक स्थान से बंधित नहीं रहे होंगे । आज भी सिरपुर का भौगौलिक क्षेत्रफल लगभग 20कि.मी. की परिधी में स्थित है। इस प्रकार सिरपुर को नागार्जुन की ध्यान स्थली कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

  • 38. तीर्थंकरों की भूमि - बस्तर (शोध से नए तथ्य उद्घाटित) छत्तीसगढ़ मंे घोर हिंसा से प्रभावित बस्तर क्षेत्र में कभी ‘अहिंसा परमोधर्म’ का शंखनाद हुआ करता था। यह पूरा बस्तर क्षेत्र जैन धर्म प्रभावशाली केन्द्र के रूप में स्थापित था। बस्तर से प्राप्त नागवंशी अभिलेखों में ‘‘जीण ग्राम’’ का उल्लेख मिलता है। तीर्थंकर आदिनाथ, तीर्थंकर नेमीनाथ, पार्श्वनाथ तथा अम्बिका देवी एवं पद्मावती देवी की प्राप्ति इस अंचल को तीर्थंकरों की भूमि कहलाने का रहस्योद्घाटन करती है।

    छत्तीसगढ़ के पुरातत्वविद् डॉ. हेमू यदु ने बताया कि जैन धर्म पर हुए अब तक शोध से यह तथ्य प्रकाश में आया है कि बस्तर जो कभी गुप्त काल में महाकान्तार क्षेत्र के रूप में प्रसिद्ध था, जिसकी पुष्टि समुद्रगुप्त के प्रयाग प्रशस्ति अभिलेख से होती है। बस्तर में विभिन्न धर्म, शैव, वैष्णव, जैन एवं बौद्ध की ‘‘कला संस्कृतियों’’ का संगम मिलता है। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र को आदिम कला संस्कृति का प्रमुख केन्द्र माना जाता है। आदिम युग का प्रतिनिधित्व करने वाला बस्तर अपनी प्राचीन धरोहर एवं पुरावशेषों के कारण पूरे देश में प्रसिद्ध है, जहाँ एक ओर बस्तर क्षेत्र में शैव, वैष्णव, बौद्ध धर्मों का प्रभाव मिलता है। वहीं जैन धर्म अपनी प्राचीन संस्कृति के लिए इस क्षेत्र में अग्रणीय मानी जाती है। छत्तीसगढ की मूर्तिशिल्प में जैन मूर्तिशिल्प का विशेष स्थान है। छत्तीसगढ के बिलासपुर-जांजगीर जिले में गुुंजी से लेकर मल्हार तक पूरा बेल्ट जैन धर्म का प्रभावशाली क्षेत्र माना जाता है। गुंजी ग्राम का ‘ऋषभतीर्थ’ जो प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव से संबंधित होने तथा बुढ़ीखार (मल्हार) में ऋषभदेव की प्रतिमाओं की उपलब्धि जैन संस्कृति की प्राचीनता को प्रमाणित करता है । पुरातत्वविद् डॉ. हेमू यदु ने बताया कि बस्तर क्षेत्र में नारायणपाल से 08 कि.मी. पूर्व दिशा में स्थित ग्राम बोदरा है, जो सघन वनों से आच्छादित है। इसी ग्राम के पश्चिम दिशा में लगभग 04 कि.मी. पर बस्तर की जीवनी-दायिनी नदी इन्द्रावती एवं नारंगी नदी का पवित्र संगम स्थल है। यहाँ पहुँचने के लिए दुर्गम मार्ग तय करना पड़ता है। वर्तमान में यह नक्सल प्रभावित क्षेत्र में माना जाता है। सुदूर अंचल में बसा यह क्षेत्र दूर-दूर तक हरितिमा बिखेरे हुए, प्राकृतिक सौन्दर्यता से परिपूर्ण है। इसी क्षेत्र में नारंगी एवं इन्द्रावती नदी के संगम स्थल पर कभी भव्य जैन मंदिर होने की जनश्रुति मिलती है। कालान्तर में मंदिर के भग्नावशेष नदी के पाट बदलने से जलप्लावित हो गया, किन्तु दैवीय कृपा से मुख्य मूर्ति जो पार्श्वनाथ की थी, वह किसी तरह सुरक्षित बच गई थी। ग्रामीणों में इसे सुरक्षित स्थान पहुँचाकर इस मूर्ति को दीवाल से जड़ दिया है। ग्रामवासी इसे गुरूबाबा के नाम से इसकी पूजा करते है तथा ग्रामीणजन इसे ग्रामदेवता भी मानते है। ग्रामीणों में इस देवप्रतिमा के संबंध में मान्यता हैै कि गुरूबाबा से मानी गयी मनौती अवश्य पूर्ण होती है। जिसके कारण यह देवप्रतिमा आस्था का प्रतीक बन गया है ।

    तीर्थंकर पार्श्वनाथ की दुर्लभ प्रतिमा डॉ. हेमू यदु ने बताया कि बस्तर के ग्राम बोदरा से जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ की दुर्लभ प्रतिमा मिली है, जो अपनी अनुपम कलाकृति के लिए इस क्षेत्र में प्रसिद्ध है। बलुआ पत्थर से निर्मित यह प्रतिमा लगभग 104 से.मी. ऊँची है। तीर्थंकर पार्श्वनाथ मूल नायक के रूप में मध्य में शिल्पांकित है। ये पद्मासन मुद्रा में ध्यानस्थ विद्यमान है। उनके नेत्र अर्द्ध निमिलित और दृष्टि नासिका के अग्रभाग पर स्थिर है। पार्श्वनाथ की नुकीली, कान लंबे, केश घुंघराले और उष्णीबद्ध है। उनकी छाती पर श्रीवत्स का अंकन है। तीर्थंकर पार्श्वनाथ की शीर्ष भाग में छत्रावली के रूप में सप्त फणों वाला सर्प प्रदर्शित है। इस छत्र के ऊपर कल्पद्रुम से लटकते हुए पत्ते और उनके ऊपर दुण्दुभिक है। छत्रफण के दोनों ओर एक-एक हाथी है, जिस पर बैठेे महावत जो खण्डित है। तीर्थंकर की दायीं ओर सौधमेन्द्र और बायीं ओर ईशानेन्द्र हाथों में चंवरी लिये खड़े है। मूल प्रतिमा चौकी पर विराजमान है। चौकी पर दो सिंहों के बीच धर्मचक्र बना हुआ है। जैन प्रतिमा विज्ञान के अनुरूप इस प्रतिमा का लक्ष-लाक्षण इन्हें पार्श्वनाथ की प्रतिमा निरूपित करती है। इस प्रकार शिल्पकला की दृष्टि से उपरोक्त प्रतिमा जैन धर्म की 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ का होना प्रमाणित होता है । छत्तीसगढ़ में पार्श्वनाथ की प्रतिमा सिरपुर, राजिम, आरंग, नगपुरा, बकेला, पंडरिया, सिलीपचराही, रतनपुर, महेशपुर आदि विभिन्न कलाकेन्द्रों से प्राप्त हुई है, किन्तु बस्तर की यह पार्श्वनाथ की प्रतिमा अति प्राचीन एवं कला की दृष्टि से उत्कृष्ट होने के कारण यह दुर्लभ कही जा सकती है। इस प्रतिमा को कला की दृष्टि से 9-10वीं शताब्दी की मानी जा सकती है। इस प्रकार बस्तर जहाँ आदिनाथ प्रतिमा से लेकर पार्श्वनाथ तक की प्रतिमा की उपलब्धि एवं अंबिका देवी तथा पद्मावती देवी की उपलब्धि इस तथ्य की पुष्टि करती है कि बस्तर क्षेत्र में प्राचीन काल में जैन तीर्थंकरों का आवागमन रहा होगा। उनकी साधना स्थली होने की भी पुष्टि करती है तथा श्रमण सम्प्रदाय का प्रमुख केन्द्र बस्तर एक शांत क्षेत्र के रूप में उन दिनों विख्यात था। बस्तर में मिले अब तक जैन प्रतिमाओं में नेमीनाथ की 02 प्रतिमाएँ, पार्श्वनाथ की 02 प्रतिमाएँ, आदिनाथजी की 03 प्रतिमाएँ, अंबिका देवी जी की 05 प्रतिमाएँ एवं पद्मावती की 01 प्रतिमाएँ अब तक प्रकाश में आई है, जो नए रहस्यों को उद्घाटित करती है एवं बस्तर को तीर्थंकरों की भूमि होने का साक्ष्य प्रस्तुत करती है ।

  • 39. शेषशायी विष्णु की दुर्लभ पद्मनाभ प्रतिमा पुजारीपाली में रायपुर। रायगढ़ जिले के अंतर्गत चन्द्रपुर से 19 कि.मी. दूर सरिया ग्राम के पास बसा प्राचीन धार्मिक नगरी पुजारीपाली का पुरातात्विक सर्वेक्षण कर, पुरातत्वविद डॉ. हेमू यदु ने बताया कि यहॉ राजा गोपालदेव द्वारा निर्मित गोपाल मंदिर का भग्नावशेष बिखरा पड़ा हुआ है, जिसमें शेषशायी विष्णु की अनुपम दुर्लभ प्रतिमा मिली है। विष्णु की यह विलक्षण प्रतिमा जलशयन रूप में प्राप्त हुआ है। इस स्वरूप की प्रतिमा केवल विष्णु की ही प्राप्त होती है, अन्य किसी देवता का शेषशायी मूर्ति प्राप्त नहीं होती। डॉ. हेमू यदु ने बताया कि विष्णुधर्मोत्तर में जलशायी विष्णु के दो रूपों का संकेत मिलता है, जिसमें एक में विष्णु शेषनाग की शैया पर बैठे हुये, विराजमान होते है। उनके सिर के ऊपर शेषनाग का विशाल फन होता है। जिसकी दायीं ओर एवं बायीं ओर सर्पयुग्म बना होता है। प्रायः यह कृति प्रायः विष्णु मंदिर के चौखट द्वार में शिल्पांकित होता है। जैसा कि सिरपुर के लक्ष्मण मंदिर में इस शिल्पांकन मिलता है। दूसरे स्वरूप में विष्णुजी शेषनाग पर शयनमुद्रा में (लेटे हुये) प्रदर्शित होते है। इनके सिरहाने के ऊपर फन काढ़े हुये शेषनाग तथा विष्णुजी के पैर को दबाती हुई देवी लक्ष्मी एवं अन्य देवी शक्तियाँ संेवा भाव में प्रदर्शित होती है। ऐसी प्रतिमा राजिम के मंदिर में मुख्य चौखट पर प्रदर्शित है। डॉ. हेमू यदु ने बताया कि वैष्णव पुराणों के प्रमुख आराध्यदेव विष्णु है। विष्णु के विभिन्न स्वरूपों में विष्णु का शेषशायी रूप को पद्मनाभ कहा जाता है। इस स्वरूप का शिल्परत्न, पद्मपुराण, विष्णु धर्मोत्तर एवं अपराजितपृच्छा ग्रन्थों में उल्लेख मिलता है। विष्णु के इस स्वरूप की कथा यह है कि अक्रूर कृष्ण और बलराम को मथुरा ले जा रहे थे, मार्ग में यमुना तट पर दोनों भाईयों ने यमुना का अमृत तुल्य जल पिया और रथ पर बैठ गये। तत्पश्चात अक्रूर यमुना में डुबकी लगाकर गायत्री का जप करने लगे, तो जल के भीतर उन्होंने दोनों भाईयों को रथ में साथ बैठे देखा, जब अपनी शंका का समाधान करने के लिये बाहर सिर निकाला, तो उन्होंने पूर्ववत दोनों भाईयों को रथ पर बैठे देखा। जल के भीतर देखे हुये रूप को भ्रम समझकर उन्होंने फिर जल में डुबकी लगायी, इस बार उन्हे शेषशायी नारायण के दर्शन हुये-उन्होंने देखा कि जल में हजारो फन फैलाये शेष पर शयन मुद्रा में विष्णुजी लेटे हुये है। उनके पैर दबाती हुई देवी लक्ष्मी, सरस्वती, काँति, कीर्ति, तुष्टि, माया आदि देवी शक्तियाँ प्रभु की सेवा कर रही है। अकूरजी विष्णु के इस अदभूत स्वरूप को देखकर आनंद विभोर हो गये। कहा जाता है विष्णु की इसी कथा से शेषशायी स्वरूप की मूर्ति निर्माण होने लगी। पुराविद डॉ. हेमू यदु ने बताया कि पुजारीपाली के इस गोपालदेव मंदिर के भग्नावशेष से विष्णु की शेैया पर लेटे हुये प्रतिमा मिली है, जिसमें विष्णुजी चतुर्भुजी है। इनके ऊपर का दाहिना हॉथ सिरहाने पर, नीचे का दाहिना हाथ शैया पर सीधा तथा इनके बॉया ऊपर का हॉथ छाती के ऊपर से मोड़कर रखा हुआ एवं ऊपर का बॉये हाथ में आयुध धारण किये हुये शयनमुद्रा मे प्रदर्शित है। घुटने तक लम्बा यज्ञोपवित, सिर पर किरीट मुकुट, छाती पर श्रीवत्स एवं गले में ग्रैवयक धारण किये हुए, सौम्य मुद्रा में शिल्पांकित है। इस प्रतिमा की विशेषता है कि यह लगभग 5 फीट लम्बा एवं डेढ़ फीट चौड़ी काले पत्थर से निर्मित है। यह प्रतिमा गोपाल मंदिर के चौखट द्वार में लगा हुआ था, जो टूटकर नीचे गिर गया है। शेषशायी विष्णु की इस की प्रतिमा शिल्पकारी उच्च कोटि की है। मूर्ति की भाव भंगिमाये कलात्मक एवं मुखर है। विष्णुजी के सिरहाने पर फन काढ़े शेषनाग एवं उसका शरीर चार स्थान से कुण्डली भूत होकर शैया के रूप में बना है। प्रभु का बॉया पैर मुड़ा हुआ शैया पर और दाहिना पैर लम्बा होकर लक्ष्मीजी के गोद पर है, जिसे लक्ष्मीजी दबाती हुई सेवा भाव के साथ उनकी दो सखी देवी सरस्वती एवं काँति, संगीत मुद्रा में वीणा लिये हुये शिल्पांकित है। इन देवियांे के पैर को शेषनाथ पूॅछ से लपेटे हुये है। यह अत्यंत दुर्लभ कृति है। डॉ. हेमू यदु ने बताया कि गोपालदेव का पुजारीपाली मेेें प्राप्त शिलालेख के अनुसार कलचुरि संवत 919 (1167-68) ईस्वी का मिला है। उसके अनुसार इस मंदिर का निर्माण उनके द्वारा कराया गया होगा तथा इस मंदिर का नाम राजा के नाम से गोपालदेव मंदिर रखा गया होगा। इसी मंदिर के भग्नावशेष में विष्णु की शेषशायी मुद्रा में विलक्षण प्रतिमा की उपलब्धि छत्तीसगढ़ की प्राचीन मूर्ति शिल्प को गौरवान्वित करती है।
  • 40. छत्तीसगढ़ में कलश/शिखर विहीन मंदिरों का रहस्य छत्तीसगढ़ को मंदिरों का गढ़ कहा जाता है। यहॉ पाषाण से लेकर ईंट के मंदिरों की भरमार है। महानदी के उद्गम से लेकर समागम तक तथा शिवनाथ, खारून, इंद्रावती, रेड़, हसदो, केलो आदि प्रमुख नदियांें के तट पर मंदिर व पुरावशेष विद्यमान है। इन मंदिरों का सांस्कृतिक वैभव, मंदिर का शिखर एवं कलश को माना जाता है। सांस्कृतिक विरासत में हमें अनेक मंदिर शिखर/ कलश विहीन मिले हैं । मंदिरों का शिखर हीन होना एक नयें रहस्य को जन्म देती है। यह कौतुहल का विषय बन गया कि इन मंदिरों के शिखर किन परिस्थितियों में अलग हुए जिसे लेकर अंचल के पुराविद ,इतिहासकारों में चर्चा का विषय रहा है । छत्तीसगढ़ के पुराविद् डॉ. हेमू यदु ने मंदिरों पर शोध करते हुये इन तथ्यों का रहस्योद्घाटन करते हुए बताया है कि छत्तीसगढ़ प्रांरभिक काल से लेकर मध्ययुगीन तक छोटे-छोटे रियासत में विभक्त था। 5वी-6वी शती ईस्वी से 10-11वी शती ईस्वी( कलचुरि काल) तक अनेक मंदिरों का निर्माण हुआ था । मंदिर एवं प्रासाद उन दिनों राजवंश के दान से अथवा राजाश्रय से निर्माण किया जाता था ऐसी स्थिति में मंदिर उस राज्य की गरिमा एवं वैभव का प्रतीक मानी जाती थी । .........शरभपुरिय काल .से कल्चुरीकाल तक अनेक मंदिरों के निर्माण के प्रमाण मिलते है । अब इन मंदिरों में शिखर विहीन होने के संबंध में यह तथ्य प्रकाश में आया है कि रियासतों के मध्य राज्य विस्तार की प्रतिस्पर्धा थी । ये एक दूसरे पर आक्रमण करते थे, पराजित करने के बाद उस राज्य की सांस्कृतिक वैभव का प्रतीक मंदिर के शिखर में मढ़े कलश को निकालकर मड़ई के रूप में विजीत राज्य में ले जाने की परंपरा थी। मंदिर निर्माण पूर्ण होने पर उसके शिखर में राजा द्वारा कलश मढ़ने की परम्परा मिलती है।

    डा0 हेमू यदु ने बताया कि छत्तीसगढ़ के अधिकांश मंदिर राजाश्रय में अथवा राजा के दान से निर्माण होने की जानकारी मिलती है । इसीलिये युद्ध में पराजित राजा के राज्य का प्रमुख मंदिर के शिखर को तोड़कर कलश को अलग कर गाजे बाजे के साथ विजय जूलुस निकाला जाता था यह विजय जूलुस मड़ई कहलाता था जिसमें बड़े-बड़े बांस में पताका को तोरण के रूप में फहराते हुये विजय जूलुस कलश को लेकर गांव गांव मेें भ्रमण करते थे । जिसे ग्रामीण लोग डॉग कहते है ।यही कारण है कि छ.ग. के अधिकांश मंदिर कलश विहीन है। डॉ0हेमू यदु ने बताया कि छ0ग0 में मड़ई परम्परा आदिकाल से चली आ रही है। मड़ा से मड़ाई, मड़ाई से मड़ई शव्द की उत्पत्ति हुई है मड़ना अर्थात सर्वोच्च स्थान में रखने वाली सामग्री जैसे मंदिर का कलश राजप्रसाद का शिखर के लिये उपयोग किया जाता था ।

  • अभिलेखों में इसका उपयोग मिलता है जैसे राजमाता वासटादेवी का लक्ष्मणमंदिर सिरपुर से प्राप्त 6-7वी शताव्दी के शिलालेख के अनुसार उसकी 22वी पंक्ति में उल्लेख होता है कि वायु के चंचल होने के कारण मंदिर के ध्वजपल्लव आकाश में क्षण में क्षण में नीचे आते और क्षण में उपर जाते है । इन ध्वजाओं के व्दारा (मंदिर) राजाओं के उन उचित गतियों को बताता है कि (जो) हरण और पालन से होती है अर्थात मंदिर से निकलने वाला ध्वजपल्लव मड़ई जो हवा के झोंके से नीचे और उपर आता जाता है वह राजा के उचित गतियों अर्थात हरण और पालन(हार-जीत) का संकेत देती है (उत्कीर्ण लेख पृ043)दूसरे शव्दों मंदिर से निकलने वाला ध्वज पल्लव ही मड़ई की संज्ञा दी जाती है किन्ते इसके स्वरुप में कोई परिवर्तन नहीं आया जैसे मड़ई का निर्माण ध्वज -पताकाओं से ही शिखर रुप लेकर किया जाता है ।इसी प्रकार प्राचीन छत्तीसगढ में ऐसी और परम्परा मिलती है कहा जाता है कि राजा किसी राज्य को जीतकर वापस लौटता था तो अपने साथ वहॉ के प्रसिध्द मंदिर का कलश को उतारकर अपने साथ ले जाता था और वह मंदिर कलश विहिन हो जाती थी मंदिर के कलश निकालने के बाद राजा ध्वज पल्लव अर्थात पताकाओं शिखरनुमा प्रंतिक तैयार कर विजयोत्सव के साथ अपने राज्य में वापस लौटता था धीरे-धीरे यह विजय प्रतीक एक मड़ई का रुप ले लिया ।चॅूकि यह एक विजयपताका है अतः विजय की खुशहाली एकत्रित जन-समुदाय के समक्ष किया जाता है । डॉ0हेमू यदु ने बताया कि छत्तीसगढ के मंदिरों में प्रमुख मंदिर भोरमदेव मंदिर का कलश विहीन होना इसका प्रमुख उदाहरण है कवर्धा के भोरमदेव मंदिर के दक्षिण व्दार के पार्श्व में जड़े हुये प्रस्तर अभिलेख से ज्ञात होता है कि संवत1608(विक्रम संवत) के19वीं पंक्ति के अनुसार महाराजाधिराज भुवनपाल (आठवें नागवंशी शासक गोपालदेव के पौत्र)के शिवालय केे कलश (भोरमदेव मंदिर का कलश)को माडव के पति (माड़व के राजा)ने तोड़ा और रतनपुर का महाराजा बाहुराय उसे विजय के रुप में ले गया अर्थात इसका आशय यह हुआ कि भोरमदेव मंदिर में अन्य मंदिरों के समान पूर्व में आमलक के उपर कलश विधमान था परन्तु मध्यकाल में अर्थात 16 वी शताव्दी में रतनपुर के शासक बाहुराय ने आक्रमण कर उसके कलश को अपने साथ विजयप्रतीक के रुप मेेें ले गया था उस कलश को तोड़ने में माड़व के राजा ने सहयोग दिया था । उदाहरण के लिये जॉजगीर का विष्णु मंदिर जिसके शिखर के भाग को उतार कर नीचे रख दिया गया है इस इस मंदिर को शिखर विहिन कर दिया गया । शिखर विहिन यह मंदिर आज भी आगन्तुक एवं श्रध्दालुगण के लिये कौतुहल का विषय है। उपरोक्त तथ्यों से मंदिरो के पुरावशेषों का रहस्योदधाटन होता है कि मंदिर के कलश एवं शिखर विहीन होने के पीछे उस क्षेत्र के राजा का पराजय था जो कलशविहिन मंदिर अपने सॉस्कृतिक विरासत लिये आज भी विधमान है ।
 
 

 

 

 
 
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