छत्तीसगढ़ की तीर्थकला

छत्तीसगढ़ संस्कृतियों का राज्य कहा जाता है। विभिन्न संस्कृतियों का उद्गम एवं विकास भारत की पावन धरा पर हुआ है। इन संस्कृतियों के संगम को तीर्थ कहा जाता है और इन तीर्थों में तत्कालीन संस्कृति की कलावैभव को कलातीर्थ से विभूषित किया जाता है। कला किसी पात्र में नहीं देखने वाले के आँखों में होती है। कला किसी की जागीर नहीं व जनसाधारण की धरोहर मानी जाती है। कला को वर्तमान युग का दर्पण कहा गया है। शिल्पकार, श्रेष्ठी एवं मूर्तिकार तत्कालीन युग को कला के माध्यम से उत्कीर्ण कर उसे दीर्घजीवी बनाते हैं। ये दीर्घकालीन कला तत्कालीन युग की समृद्धि एवं उनकी वैशिष्ठता को प्रदर्शित करती है। जहाँ विभिन्न संस्कृतियों का संगम आदिकाल होता रहा है। इसी कारण से छत्तीसगढ़ को सांस्कृतिक धरोहर की नगरी कहा जाता है। इस अंचल को प्रकृति की अनुपम देन हैं। प्राकृतिक सुषमा बिखेरती छत्तीसगढ़ सदियों से आकर्षण का केन्द्र रही है। वैदिक युग में यहाँ ऋषि परंपरा होने की जानकारी मिलती है। ऋषियों के तपोभूमि नदी के तटों पर उपलब्ध होना, इस तथ्य की पुष्टि करती है। छत्तीसगढ़ की पौराणिक नदियों में महानदी (चित्रोत्पला), शिवनाथ नदी (शिवा), इन्द्रावती (मंदाकिनी), रेणनदी (रेणुका) आदि विभिन्न नदियों के तट पर अनेक संस्कृतियों का संगम मिलता है। इन संस्कृतियों के कला अवशेष नदी तट पर धरोहर के रूप में विद्यमान हैं। इन कला अवशेषों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि विभिन्न धर्मों के उपासनागृह, स्मारक आदि तत्कालीन शासकों द्वारा बनवाया गया। इसकी विशेषता यह है कि एक ही स्थान पर विभिन्न धर्मों के धरोहर की उपलब्धि तत्कालीन शासकों के धर्म सहिष्णुता का परिचायक है। उनके द्वारा सभी धर्मों को प्रचार-प्रसार एवं विस्तार करने का समान अवसर दिया गया। फलस्वरूप इनके कला अवशेष धरोहर के रूप में विद्यमान हैं। विभिन्न धर्मों के कला अवशेषों के संगम स्थल को कलातीर्थ के रूप में मान्यता दी जाती है। इस कृति में छत्तीसगढ़ के प्राचीन धरोहर जो अपनी कला वैशिष्ठता के कारण पूरे देश में प्रसिद्ध हैं। जैसेर्- इंटों से निर्मित सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर, छत्तीसगढ़ का खजुराहो-भोरमदेव, ताला की अद्भूत प्रतिमा, मंदिरों की नगरी राजिम, शिव मंदिर खरौद, डीपाडीह के पुरावशेष एवं पचराही के पुरावशेष आदि अनेक सांस्कृतिक धरोहर है, जो अपनी कलाकृति के कारण पूरे देश में विख्यात हैं। यहाँ तीर्थ की भी प्राचीन परंपरा मिलती है। राजिम त्रिवेणी संगम सोण्ढुर, पैरी एवं महानदी पर स्थापित हैं। इस अंचल की प्रमुख धार्मिक केन्द्र होने के कारण राजिम को प्रयागतीर्थ कहा जाता है। यहाँ अनेक प्राचीन मंदिरों का समूह मिलता है तथा शैव, वैष्णव, जैन, बौद्ध सभी के उपासनागृह एवं मूर्तिशिल्प की उपलब्धि इसे तीर्थ के रूप में स्थापित करती है। चूँकि यहाँ के प्रमुख देवालय राजीवलोचन का प्राचीन मंदिर, दानेश्वर शिव मंदिर, रामचन्द्र मंदिर, पंचेश्वर महादेव, तेलिन राजिम मंदिर, भूतेश्वर मंदिर, जगन्नाथ मंदिर, सोमेश्वर महादेव, कुलेश्वर महादेव एवं लोमश ऋषि का आश्रम हैं। यहाँ पंचकोशी यात्रा की प्राचीन परंपरा मिलती है। कुलेश्वर महादेव से 5-5 कोश की दूरी पर ब्रह्मनेश्वर महादेव, पटेश्वर महादेव, चंपकेश्वर महादेव, फिंगेश्वर महादेव एवं कोपेश्वर महादेव के मंदिर स्थापित है, जो कमल के पंखुड़ी के समान हैं। इसी कारण से इसे कमल क्षेत्र भी कहा जाता है। छत्तीसगढ़ के शिवरीनारायण क्षेत्र में खरौद स्थित लक्ष्मणेश्वर महादेव तथा शिवरीनारायण का मुख्य मंदिर हैं। शिवरीनारायण में संगम होने के कारण इसे बद्रीतीर्थ कहा जाता है। शिवरीनारायण से भोग चढ़ाने के बाद ही जगन्नाथ मंदिर पुरी में भोग चढ़ाने की प्राचीन परंपरा मिलती है। जांजगीर जिले के गुंजी में ऋषभतीर्थ का अभिलेख एवं बुढ़ीखार में ऋषभदेव के मूर्तियों का समूह मिलने से इन्हें ऋषभतीर्थ भी कहा जाता है। सिरपुर शैव, वैष्णव, बौद्ध, जैन सभी धर्मों का प्रमुख केन्द्र रहा है। यहाँ के उत्खनन से अनेक बौद्ध बिहार, शिवमंदिर, महल तथा अनेक पुरातात्विक स्थल मिले हैं। सिरपुर में लक्ष्मण मंदिर, राम मंदिर तथा गंधेश्वर शिव मंदिर आदि है। बौद्धों धर्म के अनेक बिहार तथा हाल में एक बौद्धस्तूप भी मिला है। यहाँ पर छठवीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग की यात्रा करने का विवरण तथा नागार्जुन जैसे रसायनविद् भी सिरपुर में अध्यापन कार्य किया करते थे। अतः सिरपुर को बौद्धों का तीर्थ कहा जाता है। छत्तीसगढ़ में डोंगरगढ़ की माँ बम्लेश्वरी, रतनपुर की महामाया एवं दंतेवाड़ा की दंतेश्वरी देवी जैसे प्रमुख देवी शक्तिपीठ होने के कारण इन्हें शक्तितीर्थ भी कहा जाता है। इस कृति में छत्तीसगढ़ के सभी प्राचीन धर्मों की मूर्तिकला का अध्ययन कर उन प्रतिमाओं का प्रतिमा वैज्ञानिक अध्ययन तथा कलापरक विश्लेषण इस कृति की उपलब्धि है, जो अध्ययेताओं, शोधार्थियों एवं जनसामान्य सभी के लिए उपयोगी होगी।

लेखक- डॉ. हेमू यदु
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