ताला की अद्भुत प्रतिमा ‘‘कालपुरुष‘‘

पुरातत्वविदों के लिये चुनौती बनी ताला की अद्भुत, जीव-जन्तुओं से शिल्पांकित मूर्ति, देशभर के पुरातत्व प्रेमियों के लिये आज भी जिज्ञासा का विषय होकर रहस्यमय है। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में स्थित ताला ग्राम पुरातात्विक धरोहर के लिये प्रसिद्ध है। रायपुर- बिलासपुर मार्ग पर 89 कि.मी. की दूरी पर अमेरी कापा ग्राम के समीप मनियारी नदी के किनारे स्थित ग्राम ताला में देवरानी-जेठानी मंदिर के भग्नावशेष मिले हैं। वर्ष 1986-88 के मध्य पुरात्तव विभाग द्वारा इस भग्नावशेषों की मलमा सफाई कराये जाने पर देवरानी मंदिर के समीप पड़ी 8.8 फीट ऊंची एवं 9 टन वजनी बलुआ पत्थर में निर्मित मानव एवं जीव-जन्तुओं की आकृति से बनी एक अद्भुत एवं रहस्यमय प्रतिमा प्राप्त हुई। यह प्रतिमा विगत् 15 वर्षो से अपनी अनुपम एवं विलक्षण कलाकृति के लिए देश में ही नहीं, अपितु विदेशों में भी ख्याति अर्जित कर चुकी हैं। अमेरिका, इंग्लैण्ड, जर्मनी आदि देशों से रिसर्च स्कालर परतिमा के रहस्य की जिज्ञासा में भारत आ चुके हैं।

देशभर के पुरातत्व मर्मज्ञों एवं पुरातत्वविद्ो अपनी-अपनी मान्यताओं के आधार पर इस प्रतिमा के लक्षण के आधार पर अलग-अलग नामकरण किये हैं। किसी ने इसे रूद्र शिव कहा, किसी ने आदि शिव, किसी ने द्वैत व्यंजना का घोतक कहा, किसी ने कला और दर्शन की संयुक्त व्यंजना का प्रतीक शिव कहा, किसी ने शिव के जीवन एवं संहार का प्रतीक माना, किसी ने शिव की विश्व रूप की प्रतिमा कहा, किसी ने भगवान परशुराम तो किसी ने लकुलिश की प्रतिमा कहा है, तो किसी ने इसे जल-जीवन का प्रतीक माना है, किन्तु अव तक इस प्रतिमा के संबंध में सर्वमान्य नामकरण नहीं हो पाया है और यह प्रतिमा एक पहेली बनी हुई है।

मेरे द्वारा पुरातत्व एवं ज्योतिषशास्त्र का अध्ययन कर एक ऐसा लक्ष-लाक्षण प्रतिमा में ढूँढा गया, जो प्रतिमा के नवीनतम रहस्य एवं नामकरण को उजागर करता है। मैने इस प्रतिमा को देव की प्रतिमा न बतलाते हुए कालपुरूष की प्रतिमा माना है।

शिल्पकला की दृष्टिकोण से विलक्षण यह प्रतिमा कालपुरूष की है, जिसके निर्माण में द्वादश राशियों की कल्पना को साकार रूप दिया गया है। ज्योतिषशास्त्र एवं प्राचीन संहिता ‘‘जातक- परिजात‘‘ के अनुसार द्वादश राशियाँ कालपुरूष की अंग मानी जाती है। मेष को सिर में, वृष को मुख में, मिथुन को स्तन मध्य में, कर्क को हृदय में, सिंह को उदर में, कन्या को कमर में, तुला को पेडू में, वृश्चिक को लिंग में एवं धनु को जंघा में, मकर को दोनों घुटने में, कुंभ को दोनों जांघों में एवं मीन को दोनों पैरों में माना गया है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार मनुष्य के अंगों में बारह राशियाँ होती है, जो राशि मनुष्य को सूट करती है, मनुष्य का वह अंग पुष्ट माना जाता है। अतः ज्योतिष में इस राशि धारित पुरुष को कालपुरुष कहा गया है। (जातक-पारिजात अध्याय-1 भारतीय ज्योतिष, जैन पृ. 163 )

प्राचीन भारत में ऋषिगण व आचार्योे को खगोल और ज्योतिष शास्त्र का अच्छा ज्ञान था, वे नक्षत्र एवं राशियों की गणना किया करते थे। तक्षशिला एवं नालंदा जैसे प्राचीन विद्यापीठ में ज्योतिषशास्त्र की शिक्षा दी जाती थी। ऋग्वेद संहिता में ‘‘चक्र‘‘ शब्द को राशिचक्र का द्योेतक माना गया है। ‘‘द्वारशारं‘‘ नाहि तज्जराय..‘‘ इस मंत्र में द्वादशारं शब्द 12 राशियों का द्योतक है। 5वीं, 6वीं ईस्वी में ज्योतिष शास्त्र अपनी चर्मोत्कर्ष पर था, उन दिनों मय-असुर‘‘ नामक आचार्य का उल्लेख आता है, जो ज्योतिष एवं वास्तुकला दोनों विषयों में पारगंत माने जाते थे। 5वी, 6वी, सदी ईस्वी में दक्षिण कोसल (छत्तीसगढ़ क्षेत्र में) शरभपुरी शासको का साम्राज्य था। इन्हें भी ज्योतिषशास्त्र का विशेष ज्ञान था। उन दिनों ताला तंत्र-साधना का प्रमुख केन्द्र माना जाता था। यहाँ की देवरानी-जेठानी मंदिर में तंत्र, साधना की योगिक क्रियायें सम्पन्न करायी जाती थी। रायगढ़ पुजारीपाली से प्राप्त गोपालदेव के शिलालेख संस्कृत भाषा में है। उसके अंतिम पंक्ति में अगस्त्य, पुलस्य, जैमिनी, लोमस, इत्यादि और मार्कण्डेय, दुर्वासा, व्यास सभी काल के वश हुए और जो दूसरे है, वे भी इस काल में ‘‘भाग्य‘‘ के वश है, जो क्षण में नष्ट हो जाता है। इस लेख से आशय यह है कि दक्षिण कोसल (छत्तीसगढ़) के शासकों द्वारा काल एवं भाग्य को जीवन में सर्वोपरि माना जाता था। फलस्वरूप तपस्वियों एवं ऋषियों को भी काल के प्राप्त में होना बताया है। ताला के पुरावशेषों में ऋषि की योग मुद्रा में एक प्रतिमा भी मिली है, जो वहाँ संरक्षित है। अतः इस काल एवं भाग्य की संरचना को साकार देने हेतु ‘‘कालपुरूड्ढ‘‘ की मूर्ति बनाई गई, ऐसा कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

ताला की इस अद्भुत प्रतिमा का शिल्पांकन प्राचीन ज्योतिष संहिता जातक-परिजात में वर्णित विधान केे अनुसार करने का प्रयास किया गया है, किन्तु इस संहिता मे मानव शरीर में प्रतीकों को दर्शाया गया, न की राशि प्रतीकों से मानव शरीर। अतः व्यवहारिक रूप में राशियों का यथास्थान रखकर मानव आकृति (कालपुरूष) बनाना असंभव होने के कारण शिल्पी ने अपनी मौलिक कल्पना से कुछ राशियों के स्थानों में परिवर्तन कर तथा कुछ राशियों के कुछ अंग को राशि का प्रतीक मानकर अंग-अपांगों में दर्शाकर यह कालपुरूष बनाया गया है, जो प्रतिमा के भव्य एवं सौन्दर्यता के लिये अति आवश्यक था। यदि कालपुरूष के प्रतीकों के अनुसार मूर्ति बनाना आसान होता, तो शायद देश के अ्रन्य भागों में भी इस प्रकार की मूर्ति मिलती। यही कारण है कि एक यह दुर्लभ प्रतिमा है।

प्रतिमा में द्वादश राशियों के प्रतीक के अलावा सर्प जो काल का प्रतीक है, सिर पर सर्प कुण्डलनी शक्ति के रूप में प्रदर्शित किया गया है, सर्प की चार कुंडली, वर्ष, मास, पक्ष एवं दिवस के रूप में प्रदर्शित है। शिरोभूषण से लेकर शरीर के बाजूबंद एवं कमर से पैर तक, हाथों की अंगुलियों में सर्प का शिल्पांकन इस मूर्ति का प्रमुख आभूषण है। काल की गणना दिवस, पक्ष मास, वर्ष के आधार पर की जाती है। कालपुरूष के अंगों में सर्प का शिल्पांकन इसी काल-गणना के अनुरूप किया गया है, जो ऊँगली सहित शरीर के विभिन्न अंग-प्रत्यंगों में उकेरी गई है। दोनों कान में कर्णाभूषणों के रूप में नृत्य मयूर का शिल्पांकन प्रतिमा की कला, वैशिष्टता हैं। प्रतिमा के दाहिने हाथ के नीचे का भाग खंडित है। इसमें आयुध के रूप में पाश या दण्ड रहा होगा। वहीं कुर्म (कच्छप) नाभि के समीप शिल्पांकित कर राशियों को संतुलित करने वाले तुला के रूप में शिल्पांकन का ध्येय का कालपुरूष की कल्पना को साकार करता है। कालपुरूष की प्रतिमा का राशिनुसार विवरण निम्न है:-

  1. मेष:-

    प्रतिमा की दोनों आँखें मेंष (मेढ़ा) की बनायी गयी है, जो अधखुली एवं बड़ी है। यह मेष राशि का प्रतीक है।
  2. वृश्चिकः-

    प्रतिमा की नासिका वृश्चिक (बिच्छू) के प्रतीक स्वरूप शिल्पांकित किया गया है।
  3. मीन:-

    प्रतिमा की मूँछे मीन राशि (मछली) से बनी हुई है।
  4. कर्क:-

    प्रतिमा की दाढ़ी (ठुड्डी) कर्क राशि (केकड़ा) से बनायी गयी है।
  5. मकर:-

    प्रतिमा के दोनो कंधों को मकर राशि से शिल्पांकित किया गया है, दोनों हाथ मगर के मुँह से निकलता हुआ प्रदर्शित है। जल एवं थल दोनों के प्राणियों के मिश्रण को मकर कहा जाता है। यह मकर राशि का प्रतीक है।
  6. मिथुन:-

    प्रतिमा के वक्षस्थल (छाती) में दो पुरूष एवं नीचे की ओर कमर में दो स्त्री की मुखाकृति की युगल प्रतिमा मिथुन राशि का प्रतीक है।
  7. कुंभ:-

    प्रतिमा के उदर भाग (पेट) को घट का स्वरूप गोलाकार रूप में शिल्पांकन कुंभ राशि का प्रतीक है।
  8. वृष:-

    प्रतिमा के पेट में जो मुखाकृति है, उसकी दोनों आँखे वृष (बैल) की हैं। ये बड़ी-बड़ी आँखे वृष राशि का प्रतीक है।
  9. तुला:-

    प्रतिमा की दोनों जंघाओं में तुला राशि का दृश्यांकन है। जंघा के मध्य में नाभि के समीप कूर्म (कच्छप) का मुंह, तुला की डंडी (मुठ) के रूप में, नीचे दो घंटीनुमा आकृति तुला के कांटे का प्रतीक हैं। जंघाओं में प्रदर्शित हाथ जोड़ती स्त्रियाँ दोनों पड़ला, तराजू का स्वरूप है। इस प्रकार कच्छप द्वारा दो मानव कृतियों को संतुलित करते हुयंे दिखाना, राशियो की संतुलन कर्ता होने की पुष्टि करता है।
  10. कन्या:-

    प्रतिमा के दोनों जांघों में (तुलाकृति) के मध्य कन्या की मुखाकृति कन्या राशि का प्रतीक है।
  11. धनु:-

    प्रतिमा के बाएं कंधे में फन उठाये सर्प की आकृति एवं बायें पैर के समीप नीचे फन काढे हुए सर्प की आकृति का स्वरूप धनुष की प्रत्यंचा अर्थात् धनुषाकृति है, जो धनु राशि का प्रतीक है।
  12. सिंह:-

    प्रतिमाकेदोनोंघुटनोंमेंसिंहकीमुखाकृतिसिंहराशिकाप्रतीकहै।

प्रतिमा की अन्य आकृतियों (प्रतीक के रूप में) नृत्य मयूर को कान के रूप मे प्रदर्शित किया गया है। वैदिक साहित्य में ‘‘द्विबर्हा‘‘ अर्थात् दुगुने बल वाला (दो कलगी वाला पक्षी कहा जाता है) जो पुरूषत्व का प्रतीक है। सिर से पैर तक पगड़ी से लेकर बाजुबंद व शरीर के अन्य आभूषण आदि में तथा अंगुलियों में सर्पांकन तथा कंधा और पैर के पास बांयी ओर धनुषाकृति में सर्प का शिल्पांकन शिल्पी की मौलिक कल्पना है। कुर्म को नाभि में स्थान देकर शरीर का संचालन कर्ता कहा गया है। यही कारण है कि प्रतिमा में कूर्म को नाभि के पास दर्शाकर राशियों को संतुलित करने वाला भार साधक (तुला के रूप में) प्रदर्शित किया गया है।
दक्षिण कोसल (छत्तीसगढ़) के शिल्पियों को ज्योतिषशास्त्र का ज्ञान था। कालपुरूपष की संरचना में अपनी बौद्धिक कुशलता का परिचय देते हुए राशि कें अंगो के प्रतीको के स्थानों में थोड़ा परिवर्तन कर ‘‘कालपुरूष‘‘ को साकार करने में वह सफल रहा है। यही करण है कि यह देश की दुर्लभ प्रतिमा बन गई। ग्रह, नक्षत्रों की स्थिति हमेशा परिवर्तनशील मानी जाती है। तत्कालीन युग में ग्रह दशा के अनुसार शिल्पी द्वारा राशियों के स्थान में परिवर्तन कर इस प्रतिमा का निर्माण किया गया, प्रतीत होता है।

देवरानी मंदिर (तारादेवी)
छत्तीसगढ़ में ताला को तंत्र-साधना का प्रमुख केन्द्र माना जाता था, जिसकी पुष्टि ताला स्थित देवरानी-जेठानी मंदिर के प्राप्त भग्नावशेषों से होती है। तंत्र-साधना में शिव की महाशक्तियाँ- दशमहाविद्या की देवियों में तारादेवी को द्वितीया कहा जाता है। जिसकी देवरानी मंदिर में संभवतः प्रतिमा स्थापित थी और द्वितीया से कालान्तर में देवरानी नामकरण होने की जानकारी मिलती है। देवरानी मंदिर में तारादेवी की मूर्ति स्थापित रही होगी। जिसके कारण से यह स्थान तारा शक्तिपीठ के नाम से अभिज्ञात था। इस मंदिर के चैखट मंें बने दोनांे ओर भयावह कीर्तिमुख का अदभूत अंकन जो वनस्पतियों की अलंकरण से सज्जित है। मंदिर के चैखट के दोनो स्तंभ पुष्प-वल्लरी से अलंकृत है। मंदिर के पाश्र्व में एक ओर गणेश एवं दूसरी ओर राजा दक्ष का प्रकोष्ठ बनाया गया है। चैखट केे दाहिने स्तंभ में शिव-पार्वती को चैपड़ खेलते दिखलाया गया है। जिसमें पार्वती की सखियाँ नन्दी के पूँछ को खिचती हुई प्रदर्शित है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि शिवजी, पार्वती से चैपड़ में नन्दी को हार गये है। मंदिर के दाहिनी ओर बनी प्रणालिका का सीधा संबंध मनियारी नदी से होना इस स्थान में बली प्रथा का प्रचलन होने की पुष्टि करती है। शिवजी द्वारा संहार किये गये पार्वती के पिता राजा दक्ष जिसका सिर मेढ़ा का है एवं पुत्र गणेश जिसका सिर हाथी के बच्चे का है। दोनों मंदिर के आजू-बाजू प्रकोष्ट में स्थापित होना इस तथ्य को इंगित करती है कि मंदिर के गर्भगृह में मुख्य प्रतिमा शिव की नहीं अपितु माँ पार्वती (तारादेवी) की मूर्ति होने की पुष्टि करती है। तारादेवी के पाश्र्व में महाकाली की अमोक्ष्य कालपुरुष को एक प्रहरी के रुप मे स्थापित किया जाना प्रतीत होता है। अतः तारादेवी शक्ति पीठ के रुप में यह स्थान प्रसिद्ध था।

जेठानी मंदिर (धुमावती देवी )
देवरानी मंदिर के समीप चारों ओर से खुले में मंदिर का भग्नावशेष है, जिसे जेठानी मंदिर कहा जाता है। इस मंदिर में चारो दिशाओं मंे सोपान है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ तंत्र-साधना एवं यौगिक क्रियाये सम्पन्न करायी जाती रही होंगी। दशमहाविद्या की देवियों में सातवे स्थान पर परिगणित धुमावती देवी को ज्येष्ठा कहा जाता है। अतः ज्येष्ठा से कालान्तर में जेठानी मंदिर नामकरण होने के संकेत मिलते है। माँ धुमावती दसमहाविद्या में एक ऐसी महाशक्ति बतलाया गया है, जो स्वयं नियंत्रिका है। ये पार्वती की स्वरुपा है। इन्होंने भुख से व्याकुल होने पर शिव जी को निगल लिया था। इसके कारण इसका कोई स्वामी नही है, इसलिए इसे विधवा कहा गया है। तांत्रिक ग्रन्थो एवं शिव पुराण में धुमावती को उग्रतारा बताया गया है, जो धुएँ से ढंकी होने के कारण धुम्रा एवं धुमावती कही जाती है। उग्र चण्डिका धारित, यह देवी खुले केशोंवाली विधवा रुप में है। कागध्वज वाले रथ पर आरुढ़ हाथ में सूप धारण किये हुये, भूख-प्यास से व्याकुल, निर्मम आँखों वाली बतायी गयी है। शिव को निगलने का तात्पर्य स्वामी का निषेध है। देवी धुमावती की कथा के अनुसार- एक बार भगवती पार्वती भगवान शिव के साथ कैलाश पर्वत पर बैठी थी, उन्होने महादेव से अपनी क्षुधा का निवारण करने का निवेदन किया। कई बार माँगने पर भी ध्यानमग्न शिवजी ने अनसुनी कर दी, तब देवी ने रुष्ट होकर शिवजी को ही निगल लिया। तब देवी ने देवों के अनुनय-विनय करने पर अपने शीर्ष भाग से मुक्ति दी थी। अतः देवी के सिर के भाग से निकलते हुये शिवजी जिसमें देवी के सिर पर उनका पैर रखा होता है। देवी असहनीय पीड़ा से व्याकुल होकर, कन्धे को झुकाकर दोनो हाथों से धरती पकड़े हुये प्रदर्शित विग्रह को धुमावती कहा जाता है। धुमावती की ऐसी ही विग्रह जेठानी मंदिर के भग्नावशेषो में प्राप्त हुई है, जिसे दक्षिण कोसल के शिल्पियों ने इस प्रसंग को बखुबी तराशकर शिल्पांकित किया है। जेठानी मंदिर से प्राप्त भग्नावश्ेाषों में ऐसी एक प्रतिमा मिली है। जिसमें देवी (स्त्री) जो बड़ी-बड़ी आँखों वाली है, जिसके सुन्दर केश मे अलंकृत आभूषण, कानो में कुण्डल, गले में हार का श्रृंगार किये हुये है, किन्तु सिर के दबाव की वेदना से उबलती हुई आँखे ,कधों को झुकाये दोनो हाथो से धरती को पकड़े हुये दिखाई गयी है। इस प्रतिमा के सिर पर पद चिन्ह अर्थात् शिवजी के पेैर है, जिसके ऊपर का भाग खण्डित है। इस प्रतिमा को धुमावती की कथा के अनुसार माँ धुमावती की प्रतिमा कही जा सकती है। जो तंत्र साधना शक्ति केन्द्र जेठानी मंदिर की प्रतिमा कहे, तो कोइ्र्र अतिसंयोक्ति नही होगी।
निर्माण काल:- ताला की इस प्रतिमा के निर्माण काल के संबंध में कुछ तथ्य प्रकाश में आये है कि जेठानी मंदिर की मलमा सफाई के समय दो मुद्राये प्राप्त हुई जिसमें एक शरभपुरी शासक प्रसन्न मात्र की ठप्याकिंत रोप्य रजत मुद्रा मिली, जिससे तत्कालीन ब्राह्मी लिपि में प्रसन्नमात्र लेख है। इसी प्रकार दूसरी मुद्रा रतनपुर के कलचुरि शासक रत्नदेव का प्राप्त हुआ है, जिसमे श्रीमद् रत्नदेव अंकित है। इस प्रकार इससे यह पुष्टि होती है कि देवरानी-जेठानी मंदिर का निर्माण शरभपुरियों के राज्यकाल 5-6वीं सदी ईस्वी में हुआ था। इस मंदिर का विकास या जीर्णोद्धार कलचुरि राजवंश में हुआ था। 5वी, 6वी सदी ईस्वी में ज्योतिषशास्त्र पूरे भारत में अपनी चर्मोत्कर्ष पर था। वही ताला का यह क्षेत्र भी इससे प्रभावित था। ताला मंदिर के भग्नावशेष में ईट मिलने से ऐसा प्रतीत होता है कि मंदिर निर्माण में ईट से किया गया था, जो मंदिर के काल निर्धारण को 5-6 वीं शती ईस्वी में होने की पुष्टि करती है। मंदिर के वास्तुकला, शिल्पकला के अनुसार देवरानी मंदिर किसी अधिष्ठात्री देवी (पार्वती स्वरूप) की मंदिर रही होगी, जहाँ पशुबलि की भी प्रथा थी, जो पुरावशेषों के प्रमाण के रूप में आज भी विद्यमान है। जेठानी मंदिर के चारो ओर खुला होने का कारण पूजा, अनुष्ठान व यज्ञस्थल रहा होगा। भग्नावशेषों में प्राप्त दशमहाविद्या की देवी धुमावती की प्रतिमा होने से तंत्र साधना का शक्ति केन्द्र एवं ज्योतिष का बहुत बड़ा केन्द्र प्रतीत होता है। प्राप्त पुरावशेषों में मानव, पशुओं के जीवन संहार का शिल्पांकन इसका प्रमाण है। असमानुपातिक भव्य जीव-जन्तुओं एवं देवी-देवताओं, स्त्री-पुरुष प्रतिमाओं का शिल्पांकन, पुरावशेषों में मानव, पशुओ के जीवन-संहार का प्रमाण है।
ताला के देवरानी-जेठानी मंदिर के भग्नावशेषों के सूक्ष्म अवलोकन से ज्ञात होता है कि यह क्षेत्र एक तांत्रिक शक्ति केन्द्र था। तंत्र-साधना की यौगिक क्रियाएँ सम्पन्न करायी जाती थी, यहाॅ कि मूर्तिशिल्प में चैपड़ में शिव की पराजय, शिवजी द्वारा संहार किये गये मेढ़ा का सिर वाला राजा दक्ष, हस्ति सिर वाले गणेशजी एवं यातना से कराहती हुई धुमावती की प्रतिमा शिव के विपरित होने व उनके अस्तित्व को नकारती है। ऐसी स्थिति में इस विचित्र जीव-जन्तुओ को धारित मूर्ति को रौद्र शिव कहना तर्क संगत प्रतीत नहीं होता, अपितु कालपुरुष की अवधारणा प्रमाणित होती है।
शिवजी का रौद्र रुप (भैरव) की प्रतिमा शास्त्रीय लक्षणों का उल्लेख, रुपमण्डन एवं विष्णुधर्मोत्तर पुराण में किया गया है। रुपमण्डन के अनुसार शिव के रौद्र रुप में बड़ी-बड़ी भयानक आँखें, बिखरे हुये जटाजूट, चैड़े नथुने, बढ़ी हुई दाढ़ी, गले में मुण्डमाला मुँह से धधकती हुई ज्वाला एवं उनकी अष्ठभुजा में तलवार, पाश, शूल, डमरु, कपाल और सर्प प्रदर्शित होना चाहिए, किन्तु ताला की प्रतिमा में सर्प को छोड़कर, शेष आयुधों का पूर्ण अभाव है तथा भैरव का वाहन श्वान का भी कही शिल्पांकन नहीं है। ऐसी स्थिति में ताला की प्रतिमा, प्रतिमाशास़्त्र के अनुरुप निर्दिष्ट न होने के कारण, इस प्रतिमा को रौद्र शिव कहा जाना तर्क संगत प्रतीत नहीं होता।
तत्कालीन युग में एक ओर राशियों अथवा कालखण्ड का महत्व और दूसरी ओर कालसर्प
को (मृत्यु) का सूचक बताने के उद्देश्य से राशि एवं काल दोनों को संयुक्त रूप से प्रदर्शित करने अथवा ज्योतिषशास्त्र में निर्दिष्ट कालपुरूष की कल्पना को साकार करने के उद्देश्य से, इस प्रतिमा का निर्माण कराया गया होगा। यह प्रतिमा किसी आराध्य देव की नहीं हो सकती, क्योंकि कालपुरूष की न तो पूजा का विधान है न ही ऐसा उल्लेख कहीं मिलता है। यह प्रतिमा देवरानी मंदिर के द्वार के पाश्र्व में एक प्रहरी के रूप में स्थापित रही होगी। जैसा की मलमा सफाई के प्रमाणित होता है। उपरोक्त विवेचन से इस दुर्लभ प्रतिमा को किसी देव से (शिव) से संबंधित न मानकर कालपुरूष की कृति कहें, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

सन्दर्भ ग्रन्थ
01. ऋग्वेद संहिता मैक्समूलर संस्करण लंदन- 1849
02. श्वेताश्वतर लक्ष्मण शास्त्री संस्करण 1927
03. देवी श्रीमदभगवत श्री वेंकटेश्वर प्रेस बंबई
(स्कंध अध्याय-5)
04. शिवपुराण श्री वेंकटेश्वर प्रेस बंबई
05. लिंग पुराण श्री वेंकटेश्वर प्रेस बंबई
06. योग कुण्डल्यूपनिषद आनंद आश्रम प्रेस, पूना 1913
07. षट्चक्र निरूपण परिपूर्णानंद
08. जातक पारिजात चैखाम्बा प्रकाशन दिल्ली
09. शतपथ ब्राम्हण अच्युत ग्रथमाला काशी
10. विष्णुधर्मोत्तर पुराण प्रिय बाला शाह (स) बडौदा 1958
11. रूपमण्डन (सूत्रधार मण्डन) बलराम श्रीवास्तव
(सं) सं0 2021 वाराणसी
12. भारतीय ज्योतिष भारतीय ज्ञानपीठ काशी, 1952 श्री नेमीचंद जैन
13 शैव मत बिहार राष्ट्र भाषा परिषद, पटना 1955 डाॅ. यदुवंशी
14. प्रतिमा विज्ञान डाॅं. श्रीमती इन्दुमती मिश्र (म0प्र0 हिन्दी गं्रथ अकादमी भोपाल 1972)
15. उत्कीर्ण लेख (गोपाल देव का पुजारीपाली शिलाालेख) बालचंद जैन 1961
16. कल्याण-शक्ति अंक गीता प्रेस गोरखपुर 1991
17. वैदिक मैथालाजी ए.ए. मेक्डानल
18. कार्पस इंस्क्रिप्शन इडिकेर व्ही.व्ही. मिराशी जिल्द-चार
19. सरपेन्ट पावर सर जाॅन वूडरफ (भूतपूर्व जज-कलकत्ता
हाईकोर्ट)
20. प्रत्यक्ष निरीक्षण के आधार पर

विश्वा मॅ खगोल शष्तरियों और ज्योतिषविदो के मध्य बहस छिड़ी हुई है की ग्रह और ंक्स्त्रों के आधार पर अमेरिका के ज्योटिस शास्त्री श्री मर्की मैककेफ़री ने इस १३वी राशि को खोज निकाला है । इस राशि को सर्प शिर्स कहा जाता है । इस प्रकार सर्प को १३वी राशि मॅ माना गया है ।
छत्तीसगढ के बिलासपुर मॅ ताला ग्राम के देवरानी - जेठानी मंदिर के भगनावशेषो से प्राप्त विचित्र जीव - जन्तूयों से निर्मित प्रतिमा प्राप्त हुई है । इस प्रतिमा को हेमू यदु ने प्रतिमा के अंग -उपांगो मे अंकित १२ राशियों के आधार पर इसे कालपुरुष निरूपित किया है । इस प्रतिमा के कंधे मे सर्प का अंकन मिलता है । ऐसा प्रतीत होता है की राशियों मे सर्प भी एक राशि मानी जाती थी । अ त: ५-६वी शताब्दी की इस अद्भूत प्रतीमे मई सर्प का अंकन इसकी पुष्टि करती है की १३वी राशि सदियों पूर्व से थी । छत्तीसगढ के शिल्पकरो को इसकी जानकारी थी । यही कारण है की इस प्रतिमा मई सर्प का अंकन इस बात की पुष्टि करती है की १२ राशियों के अतरीकिट १३वे राशि के रूप मे सर्प का अंकन किया गया है । अ त: ता ला की कालपुरुष प्रतिमा इस तथ्य को निरूपत करती है की सदियों पूर्व ग्रह ंक्षत्रों के आधार पर १३वी  राशि के रूप मे विधयमान थी , जिसके प्रमाण स्वरूप विश्व की दुर्लभ प्रतिमा " कालपुरुष " छत्तीसगढ की अस्मिता के रूप मई आज भी विधयमान है ।


 

 

 

 
 
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