ओम नमः शिवाय- एक साँकेतिक लिपि

ॐ एक सांकेतिक लिपि है । इस सांकेतिक लिपि का शाब्दिक अर्थ ष् ॐ नमः शिवाय ष् होता है । सांकेतिक लिपि में रेखाक्षर ॐ की उतपत्ति कैसी हुई घ् इस लिपि की प्राचीनता क्या है ए इस समबन्ध में इसकी व्याख्या करने के पूर्व शिव महिमा का विश्लेषण आवश्यक है । शव से शिव बना शिव से संसार । शिव ही एक ऐसे देखता है जिनकी आराधना वैदिक काल के पूर्व से होने की जानकारी मिलती है । वैदिक काल में शिव का रूद्र रूप अधिक प्रधान था । श्वेतावातर उपनिषद् में रूद्र के अनेक नामों के साथ शिव का भी उल्लेख्य हुआ है । उपनिषदों में शिव रूद्र ए महादेव ए महेश्वर और इशान आदि नाम इन्हेंसर्व प्रमुख देवता सिद्ध करने के लिए प्रयुक्त्त हुए है । अथर्वेद में भव ए शर्व ए पशुपति ए रूद्र ए उग्र ए महादेव तथा ईशान इन सात नामों का उल्लेख्य है । शतपथ और कोशितिक और कोशिब्की ब्रह्मण में इन सात नामों में आशाती रूप को जोड़कर आठ नामों की पूर्ति कर देते है । इनके भाव ए पशुपति ए महादेव और ईशान यह चार नाम कल्याणकारी और रक्षक है तथा शर्व ए रूद्र एउग्र और अशांति ए यह चार विनाशक रूप है । इन रूपों में भी सोम्य तथा अधोर दो प्रकार है । पादिनी ने अपनी में रूद्र के भव ए शर्व मूढ़ आदि नामों का उल्लेख्य किया है । पतंजलि ने रूद्र तथा शिव आदि रूपों को पशुता रूद्र उजेत अथवा शिव रुद्रस्य भिस्जी कहकर अत्यधिक महत्वपूर्ण बनाया । रामायण में राम और शिव के लिए शंकर ईशान शव नीलकंठ नन्दीश्वर शिरीष व्योमकेश महार तथा शितिकंठ आदि नाम आये है । पुरानो में प्रयुक्त शंकर और शम्भू नाम कल्याणकारी है । इस प्रकार इसकी महत्ता पुरातन काल से है किन्तु ॐ शब्द का उल्लेख्य पुर में कहीं नहीं मिलता ए ॐ नमः शिवाय मूल संस्कृत की भाषा है । वैदिक युग में संस्कृत एक सम्र्ध्शाली भाषा थी ।

किन्तु इस भाषा में सांकेतिक लिपि के प्रचलन का कहीं उल्लेख्य नहीं मिलता । ॐ एक श्रुत्त लेखन अथार्त शिग्रह लेखन की एक परिष्कृत सांकेतिक लिपि है । इस लिपि में ॐ नमः शिवाय उछारण है । अर्थात यह एक ऐसा शाब्दिक अर्थ है जिसमे भगवान शिव को इस उच्चारण से दो बार स्मरण किया जा सकता है ।

इस प्रकार ॐ नमः शिवाय नमः शिवाय स्पष्ट सांकेतिक लेख है । अर्थात ॐ नमः शिवाय जैसे उच्चारित करने वाले शब्द को एक सांकेतिक स्वरुप देने ही इसका प्रयोजन किया गया है । ॐ नमः शिवाय एक संकेतिल लिपि की रेखा अक्षरों का वर्गीकरण शिग्ढ़ लेखन के आधार पर करें तो इसके उर्धगामी रेखाक्षर का समावेश किया गया है । लिपि में स्तिथि के अनुसार व्यंजन में स्वर और अनुसर्ग का संकेत है । अतः ध्यान से देखे तो लिपि को शिव प्रतिक के रूप में आकृति प्रदान की गयी है । इस आकृति में त्रिशूल में डमरू का आकर अथवा शिव की जता में अर्धचन्द्र प्रवाहित गंगा का स्वरुप स्पस्ट दीखता है । जो इस सांकेतिक लिपि की विशेषता है ।

इसके पूर्व किसी भी धार्मिक ग्रन्थ में शाब्दिक अर्थो के लिए सांकेतिक लिपि का प्रयोग कदापि नहीं मिलता । यदि हम मान ले की महाभारत काल में इस सांकेतिक लिपि का प्रदुभार्व हुआ तो कोई अतिसंयोक्ति नहीं होगी । ज्ञान्तव हो की महारिशी वैद व्यास जी को महाभारत लेखन हेतु एक योग्य और कुशल लेखक की आवश्यकता थी ए इस कार्य हेतु गणेशजी का चयन किया गया था । वे गणेश जी ने महाभारत के लेखन प्रारंभ के पूर्व अपने पुज्निये पिताश्री शिव जी की आराध्य हेतु सर्व प्रथम ॐ को लेख किया था । जो कालांतर में ॐ नमः शिवाय नमः शिवाय शैव आराध्य का उछारण मन्त्र बन गया ।

गणेश की जो ष् प्रथम पूज्य देव ष् की घोषणा शिव जी द्वारा करने पर ष्प्रथम देव पूज्यते ष् की सर्वमान्यता पर गणेश को उनके पिता के स्थान पर अर्थात ॐ नमः शिवाय के स्थान पर श्री गणेशाय नमः लेख कर शुभारम्भ में गणेशजी का सम्मान किया जाता है ।श्री गणेशाय नमः का कोई शाब्दिक अर्थ अर्थात सांकेतिक लिपि कहीं नहीं मिलती ।

अस्तु यह कहना ज्यादा उचित प्रतीत होता है की ॐ नमः शिवाय के जनक अर्थात अन्वेषक गणेश जी ही थे जिन्होंने अपने पूज्य पिता श्री कोई कार्य शुभारम्भ में आराध्य ॐ करने हेतु इस सांकेतिक लिपि का प्रयोग किया था । जो सांकेतिक लिपि में ॐ नमः शिवाय नमः शिवाय की ध्वनि का प्रतिपादक है ।

ॐ नमः शिवाय बीज मन्त्र के अंतर्गत दो बार उच्चारण ॐ नमः शिवाय नमः शिवाय का होता है ए जो उपरोक्त ॐ रेखाकृति में उच्चारित है और पूरब बीज मन्त्र का परिचायक है । इस शोध पत्र से यह निष्कर्ष निकलता है की ॐ रेखाकृति लिखकर ॐ नमः शिवाय देवनागरी लिपि में लेख करना अब अवय्श्यक नहीं है ।

सांकेतिक ॐ में सम्पूर्ण बीज मन्त्र ष् ॐ नमः शिवाय नमः शिवाय ष् समाहित है ।



 

 

 

 
 
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