सदियों से छत्तीसगढ़ रहस्य और रोमांच का गढ़ माना जाता हैं। यहाँ के सघन वन और विशाल नदियाँ आकर्षण का केन्द्र बिन्दु रही है। अनेक ऋषि-मुनियों के द्वारा इन नदियों के तट पर अपनी तपोभूमि एवं आश्रम स्थापित करने की जानकारी मिलती हैं। छत्तीसगढ़ में विशाल नदियों का जाल बिछा था। नदियाँ ही सुगम मार्ग हुआ करता था। छत्तीसगढ़ में नदियों का पौराणिक महत्व है। इन नदियों में महानदी, इंद्रावती, शबरी, रेणनदी, हसदेव, माण्ड, मवाई, बनास नदी आदि ऐसी नदियाँ थी, जो एक-दूसरे से संगम करते हुए कोरिया से कोन्टा तक प्रवाहित होती थी। ये नदियाँ ही उत्तर से दक्षिण को जोड़ने वाली दक्षिणापथ की महत्वपूर्ण नदियाँ मानी जाती हैं। इन नदियों के तट पर अनेक संस्कृतियों का उद्भव एवं विकास की गाथा मिलती हैं। प्रभु श्रीराम इन्हीं नदियों के तट से होकर वनगमन करते हुए अयोध्या से दक्षिण की ओर गये थे। उनके चरण कमल से इन नदियों के पावन तट पवित्र हुए थे। उनकी इन्हीं स्मृतियों को तत्कालीन शासकों ने धरोहर एवं स्मारक के रूप में मंदिरों का निर्माण नदी तट पर करवाया। यह प्रमाण के रूप में आज भी विद्यमान हैं। इस शोध कार्य में छोटी-बड़ी 20 नदियों का संगम, 24 ऋषि आश्रमों का विवरण तथा वानस्पतिक प्रमाणों को लेकर छत्तीसगढ़ में श्रीराम वनगमन पथ को प्रमाणित किया गया हैं।

  • 1.रामायण कालीन प्राचीन गुफा मंदिर सीतामढ़ी हरचैका भरतपुर, जिला कोरिया में स्थित हैं। इस प्राचीन गुफा मंदिर में 17 कक्ष हैं, जिसमें द्वादश शिवलिंग है तथा अन्य कक्षों में अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ संरक्षित हैं। मवाई नदी के तट पर बना यह गुफा मंदिर के संबंध में जनश्रुति है कि वनगमन करते समय भगवान श्रीराम यहाँ ठहरे थे। सीताजी ने रसोई बनाई थी, इसे सीता रसोई या हरचैका (हरि का चैका) कहा जाता हैं।
  • 2.सीतामढ़ी हरचैका स्थित गुफा मंदिर में प्राचीन शिवलिंग स्थापित हैं। इन्हीं शिवलिंगों में से एक प्रमुख शिवलिंग का चित्र हैं, जिसमें जलहरि विशेष प्रकार से बनाई गई हैं। जिसके कारण यह दुर्लभ शिवलिंग माना जाता हैं।
  • 3.गुफा मंदिर घाघरा, कोरिया जिले में स्थित हैं। यह सीतामढ़ी हरचैका से 25 किमी. नेउर नदी के तट पर स्थित हैं। प्रभु श्रीराम वनगमन करते समय यहाँ कुछ समय व्यतीत किये थे, ऐसी जनमान्यता हैं। गुफा के अंदर 03 कक्ष है, जिसमें एक कक्ष में शिवलिंग स्थापित हैं।
  • 4.अम्बिकापुर से बनारस रोड पर महान नदी के तट पर बना प्राचीन गुफा जहाँ महरमण्डा ऋषि का आश्रम होने की जनश्रुति मिलती हैं। प्रभु श्रीराम महरमण्डा ऋषि से मिलने यहाँ वनगमन के समय यहाँ पहुँचे थे। ऊँ की आकृति में बना इस गुफा को बिल द्वार गुफा कहा जाता हैं।
  • 5.अम्बिकापुर के बनारस रोड पर महान नदी के तट पर बना यह सरासोर नामक स्थान हैं। जहाँ पर महान नदी दो पर्वतों को चीर कर मध्य में बहती हैं। इसके तट पर बना हुआ प्राचीन श्रीराम मंदिर हैं। सर-असुर नामक दो राक्षसों का वध वनगमन करते समय श्रीराम द्वारा इसी स्थल पर किया गया था। अतः सर एवं असुर के नाम पर इस स्थान का नाम सरासोर पड़ा।
  • 6.महेशपुर का प्राचीन शिवलिंग अंबिकापुर जिले में स्थित हैं। महेशपुर एक प्राचीन एवं पुरातात्विक स्थल हैं। रेणनदी के तट पर बसा प्राचीन नगरी महेशपुर के भग्नावशेष यहाँ टीले के रूप में बिखरे हुए हैं। शैव, वैष्णव, जैन, बौद्ध सभी धर्मों का सांस्कृतिक स्थल के रूप में प्रसिद्ध महेशपुर अपनी प्राचीन विरासत के लिए छत्तीसगढ़ में प्रसिद्ध हैं।
  • 7.अंबिकापुर जिले में सीतापुर के आगे महारानीपुर हैं। जहाँ पर प्राचीन मंदिर के अवशेष बिखरे पड़े है। महारानीपुर अपनी प्राचीन विरासत के लिए प्रसिद्ध हैं। वनगमन करते समय इस स्थान से होकर प्रभु श्रीराम आगे बढ़े थे, इसलिए इसका अत्यधिक महत्व हैं।
  • 8.अंबिकापुर जिले में उदयपुर नामक स्थान पर रामगढ़ की पहाड़ी को काटकर बनाया गया प्राचीन गुफा सीताबंेगरा स्थित हैं। इस गुफा को प्राचीन नाट्यशाला भी कहा जाता हैं। गुफा में उत्कीर्ण ब्राह्मी लिपि मे देवदासी सुतनुका एवं रूपदर्शक राजकुमार की प्रणय गाथा लेखबद्ध हैं। इसी कारण से इसे प्राचीन नाट्यशाला कहा जाता हैं। वनगमन करते समय प्रभु श्रीराम रामगढ़ की पहाड़ी पर पहुँचे थे। तब सीताजी ने इसी गुफा में विश्राम किया था। इस कारण से इसे सीताबेंगरा गुफा कहा जाता हैं। इसी के पास ही हाथीपोल नामक स्थान है, यहाँ पर रामगढ़ की पहाड़ी के मध्य एक बड़ा पोल यानि छेद है। जिसमें हाथी आसानी से पहाड़ी के उस पार जा सकता है, इसीलिए इसे हाथीपोल भी कहा जाता हैं। प्रभु श्रीराम इसी पोल से गुजरकर आगे लक्ष्मणगढ़ पहुँचे थे, जो रेणनदी के तट पर स्थित हैं।
  • 9.अंबिकापुर जिले में सूरजपुर नामक स्थान पर प्राचीन राम मंदिर स्थापित हैं। इस मंदिर के संबंध में मान्यता है कि प्रभु श्रीराम इस स्थान से होकर विश्रामपुर पहुँचे थे। अतः यहाँ पर उनकी स्मृति में बनाया गया श्रीराम मंदिर विद्यमान हैं।
  • 10.छत्तीसगढ़ में दुर्लभ शिवलिंग के रूप में खरौद का लक्ष्मणेश्वर शिवलिंग प्रसिद्ध हैं। इस शिवलिंग में 01 लाख छिद्र होने के कारण लक्षेश्वर तथा भगवान श्रीराम के साथ लक्ष्मण के द्वारा इस मंदिर में अभिषेक करने के कारण इसे लक्ष्मणेश्वर शिवलिंग भी कहा जाता हैं।
  • 11.महानदी के तट पर बसा नारायणपुर, रायपुर जिले में स्थित हैं। इस मंदिर में विष्णु की प्रतिमा स्थापित हैं। प्रभु श्रीराम वनगमन करते समय इस स्थान से गुजरे थे तथा नदी के तट पर शिवलिंग बनाकर अभिषेक किये थे। शिवजी का प्राचीन मंदिर भी स्थापित हैं, जो ईंटों से निर्मित हैं।
  • 12.बारनवापारा आरण्य के समीप मुख्य द्वार के पास तुरतुरिया नामक ग्राम हैं, जहाँ वाल्मीकि आश्रम स्थित हैं, इसे वैदेही आश्रम भी कहा जाता हैं। सीताजी अपने दोनों पुत्रों के साथ इसी आश्रम में रहती थी। उनकी स्मृति में दो बालकों द्वारा अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े को पकड़ने का विग्रह मंदिर में स्थित हैं। इसे लव-कुश आश्रम भी कहा जाता हैं। बालमदेही नदी के तट पर बसा यह वाल्कीकि आश्रम रामायण कालीन प्राचीन आश्रम के रूप में विद्यमान हैं। कालान्तर में बौद्ध काल में बौद्ध भिक्षुणियों का भी आश्रय के रूप में विख्यात था।
  • 13.सिरपुर में स्थित ईंटों से निर्मित लक्ष्मण मंदिर अपनी वास्तुकला के कारण पूरे देश में प्रसिद्ध हैं। महारानी वासटा देवी द्वारा अपने पति हर्षगुप्त की स्मृति में आठवीं शताब्दी में बनवाया गया। यह प्राचीन लक्ष्मण मंदिर, जिसके गर्भगृह में लक्ष्मण की शेषावतार स्वरूप की प्रतिमा स्थापित हैं। इस मंदिर की ईष्टिका कला के कारण इसे ईंटों का ताजमहल भी कहा जाता हैं।
  • 14.प्रभु श्रीराम की जननी माता कौशल्या का जन्मस्थली आरंग को माना जाता हैं। प्राचीन समय मंे आरंग के क्षेत्र में ही चन्द्रखुरी नामक प्रमुख स्थान था। चन्द्रखुरी ग्राम में माता कौशल्या का प्राचीन मंदिर हैं। इस मंदिर में माता कौशल्या द्वारा भगवान श्रीराम को गोद में उठाये हुए मूर्ति स्थापित है, जो भारतवर्ष में दुर्लभ प्रतिमा कहीं जाती हैं। माता कौशल्या का एक मात्र मंदिर छत्तीसगढ़ मंे चन्द्रखुरी ग्राम में स्थित है।
  • 15.छत्तीसगढ़ का प्रयागतीर्थ राजिम, जहाँ महानदी, सोण्ढुर और पैरी नदी का संगम हैं। इस त्रिवेणी संगम के पास बसा राजिम में राजीवलोचन का प्रसिद्ध मंदिर हैं। इस मंदिर के गर्भगृह में विष्णुजी की चतुर्भुजी प्रतिमा स्थापित हैं। 5वीं शताब्दी में निर्मित छत्तीसगढ़ का प्राचीन मंदिर कहा जाता हैं। इस मंदिर को 5-11वीं शताब्दी के मध्य जीर्णोद्धार एवं नवनिर्माण करवाया गया था। राजिम आज पाँचवें कुंभ के रूप में प्रसिद्ध हो रहा हैं।
  • 16.महानदी के तट पर बना कुलेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर, जो पंचकोशी यात्रा का प्रमुख मंदिर माना जाता हैं। प्रभु श्रीराम वनगमन करते समय नदी तट पर रेत से शिवलिंग बनाकर पूजा-अर्चना की थी। उनकी स्मृति में बनाया गया यह कुलेश्वर महादेव स्थापित हैं। समीप ही सीता वाटिका भी हैं। इसी मंदिर के पास ही लोमश ऋषि का आश्रम हैं। लोमश ऋषि रामायण कालीन ऋषियों में प्रमुख माने जाते हैं। इस ऋषि से मिलने भगवान श्रीराम वनगमन करते समय इस आश्रम में भी कुछ समय व्यतीत किये थे।
  • 17.धमतरी जिले में कुरूद के पास महानदी तट पर डोंगेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर हैं। महानदी के तट पर एक उल्टे हुए नाव का जीवाश्म रखा हुआ हैं, जो नाव का निचला हिस्सा है। यह 10 फीट लंबा हैं। सदियों से पानी में डुबे रहने से नाव पत्थर के रूप में परिवर्तित हो गया। कहा जाता है कि नाव यहाँ पर उलट गई थी। उस नाव पर भाँजे श्रीराम के साथ ग्रामवासी भी थे, तब से यह जनश्रुति प्रचलित है कि मामा-भाँजा एक साथ नाव में नहीं बैठते, इसे डोंगा पथरा कहा जाता हैं।
  • 18.छत्तीसगढ़ की पौराणिक नदी महानदी का उद्गम क्षेत्र सिहावा पर्वत को माना जाता हैं। सिहावा पर्वत से होकर उद्गमित इस नदी का गणेश घाट के पास एक छोटा सा वृत्ताकार में छिद्र हैं। यहीं से महानदी उद्गमित होती है और यहीं नदी छत्तीसगढ़ सिंचित करते हुए उड़ीसा से होकर बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। इस नदी के उद्गम के संबंध में जनश्रुति मिलती है कि श्रृंगि ऋषि ध्यान मग्न थे। उनके कमण्डल से गिरकर जल नदी के रूप में प्रवाहित होती है और वह पहाड़ से नीचे उतरकर दाहिनी ओर दक्षिण दिशा की ओर प्रवाहित होती हैं। तभी श्रृंगि ऋषि का ध्यान टूटता हैं। उसे जानकारी मिलती है कि नदी दक्षिण दिशा की ओर प्रवाहित हो रही हैं। वे नदी को तुरंत वहाँ से लौटने का आदेश देते है तथा उसे उत्तर दिशा में जाने का निर्देश देते हैं। महानदी दक्षिण दिशा में लगभग डेढ़ किमी. तक प्रवाहित होने के बाद वापस लौटकर उत्तर की ओर बहती हैं। यह एक आश्चर्यजनक भौगोलिक घटना हैं। भौगोलिक सर्वेक्षण से इसकी पुष्टि होती हैं। यह बात सत्य है कि महानदी लौटकर दक्षिण से उत्तर की ओर प्रवाहित होती है, इसलिए इस नदी को महा अर्थात् महानता होने का गौरव प्राप्त होता हैं और इस नदी का नाम पुराणों में चित्रोत्पला, नीलोत्पला एवं वर्तमान में इसे महानदी से विभूषित किया जाता हैं।
  • 19.सिहावा क्षेत्र में जिस पर्वत में श्रृंगि ऋषि निवास करते थे, उसे श्रृंगि पर्वत नामक होने की जनश्रुति मिलती हैं। श्रृंगि ऋषि का विवाह रामचन्द्र की बहन शांता से हुआ था। अतः समीप में इसी श्रंृगि पर्वत में शांता गुफा भी हैं। रामायण कालीन प्रसिद्ध सप्त ऋषि-मुनियों ने श्रृंगि ऋषि प्रमुख माने जाते हैं। इसी पर्वत से महानदी का उद्गम हुआ हैं।
  • 20.सिहावा क्षेत्र में रामायण कालीन कन्क ऋषि के नाम पर कन्क ऋषि पर्वत विद्यमान हैं। कहा जाता है कि भगवान श्रीराम वनगमन के समय इन ऋषियों से मिलने के लिए यहाँ आये थे। कन्क की कांकेर की स्थापना हुई है, ऐसी जनश्रुति मिलती हैं।
  • 21.रामायण कालीन सप्त ऋषियों में शरभंग ऋषि प्रमुख ऋषि माने जाते हैं। प्रभु श्रीराम इनसे मिलने सिहावा क्षेत्र में आये थे, ऐसी जनश्रुति मिलती हैं। शरभंग ऋषि के नाम से शरभंग पर्वत है, जहाँ पर शरभंग ऋषि का आश्रम हैं।
  • 22.रामायण काल में अगस्त्य ऋषि की महत्वपूर्ण भूमिका रही हैं। छत्तीसगढ़ के सिहावा क्षेत्र में अगस्त्य ऋषि का आश्रम मिलता है तथा इन्हीं के नाम पर अगस्त्य पर्वत भी हैं। अगस्त्य जी को आर्य संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए अधिकृत किया गया था। वे उत्तर से दक्षिण में इसी पुनित कार्य के लिए यहाँ आये थे एवं यहीं से वे दक्षिण में प्रवेश किये थे। उनके जाने वाले मार्ग को दक्षिणापथ कहा जाता हैं।
  • 23.रामायण कालीन ऋषियों में मुचकुन्द ऋषि एक प्रमुख ऋषि थे। सप्त ऋषियों में इनका भी नाम हंै। इन्हीं के नाम पर सिहावा क्षेत्र में मेचका पर्वत अर्थात् मुचकुन्द पहाड़ी हैं। जहाँ पर मुचकुन्द ऋषि का आश्रम हैं।
  • 24.रामायण कालीन ऋषियों में गौतम ऋषि प्रमुख ऋषि माने जाते हैं। सप्त ऋषियों इनका भी नाम हैं। गौतम ऋषि जिस स्थान पर आश्रम बनाकर रहा करते थे। वह स्थान गौतम ऋषि के नाम पर गौतम पर्वत में प्रसिद्ध है, जो सिहावा क्षेत्र में स्थित हैं।
  • 25.छत्तीसगढ़ के सिहावा क्षेत्र में सप्त ऋषियों में से अंगिरा ऋषि का भी महत्वपूर्ण स्थान हैं। इनके नाम पर सिहावा में पर्वत है, जिसे अंगिरा पर्वत कहा जाता हैं। रामायण काल में भगवान श्रीराम अंगिरा ऋषि से भी भेंट कर उनसे परामर्श लिये थे।
  • 26.बस्तर क्षेत्र में नारायणपाल में एक विष्णु का प्राचीन मंदिर हैं। ऐसी जनकथा मिलती है कि भगवान श्रीराम वनवास काल में इस क्षेत्र से गुजरे थे। अतः उनकी स्मृति में नारायण मंदिर की स्थापना की गई हैं। 9-10वीं शताब्दी का यह प्राचीन मंदिर बस्तर क्षेत्र की अस्मिता हैं।
  • 27.बस्तर क्षेत्र में चित्रकोट जलप्रपात पूरे देश में प्रसिद्ध हैं। इन्द्रावती से गिरने वाला जलप्रपात ऊँचाई के कारण नहीं, अपितु अपनी चैड़ाई के कारण इसे छत्तीसगढ़ का न्याग्रा जलप्रपात कहा जाता हैं। लगभग 300 मीटर चैड़ा यह जलप्रपात प्राकृतिक सौन्दर्यता के कारण पर्यटकों का मन मोह लेती हैं। इसे धुँआधार जलप्रपात भी कहा जाता हैं। मटमैले रंग में गिरने वाली यह जलप्रपात सूर्य की किरणों से इन्द्रधनुषी रंग बिखेरती हैं।
  • 28.बस्तर क्षेत्र में कांगेर नदी के तट पर बसा तीरथगढ़ जलप्रपात स्थित है। यह जलप्रपात पर्वत से दूधिया स्वरूप लेकर प्रवाहित होती हैं एवं नयनाभिराम दृश्य प्रकट करती हैं। तीरथगढ़ क्षेत्र में यह जलप्रपात तीरथगढ़ के नाम से प्रसिद्ध हैं। ऊँचाई से गिरकर यह इन्द्रधनुषी छटा बिखेरती हैं।
  • 29.बस्तर क्षेत्र में बारसूर नामक स्थान पर विश्व प्रसिद्ध गणेश की दो प्रतिमाएँ मिली हैं। इन प्रतिमाओं के संबंध में जनश्रुति है कि इतनी बड़ी विशाल प्रतिमाएँ अन्यत्र कहीं नहीं मिलती। बाणासुर की राजधानी बारसूर में गणेश प्रतिमा की उपलब्धि इस तथ्य की ओर इंगित करती है कि गणों के पति, गणपति एवं गणो के अध्यक्ष गणाध्यक्ष बाणासूर की प्रिय इष्टदेवों में माना जाता हैं। अतः बारसूर में स्थापित गणेश मंदिर अपनी कलात्मक विशेषता के साथ-साथ भव्यता के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध हैं।
  • 30.छत्तीसगढ़ के प्रमुख शक्तिपीठों में दंतेवाड़ा की दंतेश्वरी देवी प्रमुख है। बस्तर क्षेत्र की प्रमुख देवियों में इनका स्थान हैं। यह बस्तर की कुल देवी मानी जाती हैं। शंखिनी-डंकिनी नदी के संगम पर बनी माँ दंतेश्वरी शक्तिपीठ का शाक्त सम्प्रदाय में अत्यधिक महत्व हैं। दंतेवाड़ा मंदिर मूलतः काष्टकला से निर्मित हैं। मंदिर के सामने गरूड स्तंभ बना हुआ हैं। यह मंदिर दक्षिण एवं उत्तर दोनों शैली से प्रभावित हैं।
  • 31.बस्तर क्षेत्र में भू-गर्भित गुफा, कोटुमसर एक प्रसिद्ध गुफा है, इसे कोटिमहेश्वर भी कहा जाता हैं। कांगेर घाटी के पास स्थित यह गुफा अपनी प्राकृतिक सुन्दरता के कारण प्रसिद्ध हैं। इस गुफा में अँधी मछलियाँ एवं मुंछ वाले झिन्गुर, चमगादड़ आदि दुर्लभ प्रजातियाँ मिलती हैं। भारत में यह प्रथम भू-गर्भित गुफा है, जो अपने क्षेत्र की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
  • 32.शिवरीनारायण क्षेत्र में खरौद का शबरी मंदिर प्राचीन मंदिर के रूप में विख्यात हैं। इस मंदिर की वास्तुकला अत्यन्त प्राचीन हैं। ईंटों से निर्मित शबरी मंदिर छत्तीसगढ़ की ईंटों की मंदिर श्रृंखला में प्रमुख मानी जाती हैं। माता शबरी के नाम से इस मंदिर का नामकरण होने की जानकारी मिलती हैं।
  • 33.उमा-महेश्वर की यह दुर्लभ प्रतिमा मल्हार से प्राप्त हुई हैं। इस कृति मंे उमा-महेश्वर अपने गणों के साथ प्रदर्शित किये गये हैं। उमा-महेश्वर शैव सम्प्रदाय का सौम्य रूप हैं, जिसमें शिवपार्वती आलिंगनबद्ध मुद्रा में आसीन बताये जाते हैं।
  • 34.छत्तीसगढ़ के खजुराहों के रूप में प्रसिद्ध भोरमदेव मंदिर अपनी कलात्मक मूर्तिशिल्प के कारण पूरे देश में प्रसिद्ध हैं। भोरमदेव मंदिर के गर्भगृह मंे शिवलिंग स्थापित हैं। 11-12वीं शताब्दी का यह प्राचीन मंदिर मूर्तिकला की दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं।
  • 35.सरगुजा के महेशपुर की मूर्तिशिल्प में विष्णु के वराह अवतार की दुर्लभ कृति प्राप्त हुई हैं। यह शिल्पकला की दृष्टि से उत्कृष्ट मानी जाती हैं। विष्णु के वराह अवतार का सुन्दर चित्रण एवं उनके साथ परिचारिकाओं का चित्रण दृश्य को मनमोहक बनाता हैं। इसी प्रकार विष्णु के एक अन्य प्रतिकृति में विष्णुजी आसीन मुद्रा में विराजमान है तथा सुर सुन्दरी उनके आसपास प्रदर्शित किये गये हैं। इसी प्रकार महेशपुर की इस प्रतिमा में स्थानक मुद्रा में प्रतिमा स्थापित है, जिसमें विष्णुजी के दो हाथ स्पष्ट है, जिसमें शंख और चक्र प्रदर्शित है, शेष दो हाथ खण्डित हैं। मूर्तिकला के दृष्टिकोण से यह 10-11वीं शताब्दी की मानी जा सकती हैं।
  • 36.छत्तीसगढ़ का खजुराहों भोरमदेव मंदिर में शिल्पांकित प्रतिमाओं में गणेश की दुर्लभ प्रतिमा शिल्पांकित हैं। जिसमें गणेशजी नृत्य करते हुए प्रदर्शित हैं। उनके पाश्र्व में मृदंग वादन करते हुए मूर्ति शिल्पांकित हैं। छत्तीसगढ़ की मूर्ति शिल्प में नृत्य, संगीत का सुन्दर दृश्य इस मंदिर की उपादेयता हैं।
  • 37.भोरमदेव मंदिर की मूर्तिशिल्प में गजराज से युद्ध करते हुए एवं घुड़सवार को रोकते हुए सुन्दर दृश्य मंदिर में प्रदर्शित हैं। यह छत्तीसगढ़ की मूर्तिशिल्प को अनुपम उदाहरण हैं।
  • 38.छत्तीसगढ़ की मूर्तिशिल्प में विष्णु के अवतारों में वामन अवतार का उल्लेख मिलता हैं। जिसमें तीन पग से पृथ्वी, आकाश एवं पाताल लोक को मापने का दृश्य मूर्तिशिल्प में प्रदर्शित हैं। विष्णु के वामन अवतार की यह दुर्लभ प्रतिमा हैं।
  • 39.देवरानी जेठानी मंदिर, ताला ग्राम बिलासपुर स्थित देवरानी मंदिर के मुख्य द्वार के दाहिने ओर सिंह की मुखाकृति उकेरी गई है, जिसे कृतिमुख कहा जाता हैं। इस कृतिमुख की शैली दक्षिण भारतीय शैली से प्रभावित हैं। शिल्पकार ने इस मूर्ति के निर्माण में वनस्पतियों की प्रतिकृति को लेकर बनाया है, जो छत्तीसगढ़ में दुर्लभ मूर्तिकला के नाम से प्रसिद्ध हैं। 6वीं शताब्दी का उत्कृष्ट मूर्तिशिल्प हैं।
  • 40.छत्तीसगढ़ की मूर्तिकला का केन्द्र स्थल सिरपुर के उत्खनन से प्राप्त बौद्ध बिहार मंे आठवीं शताब्दी का एक ऐसा बौद्ध स्तंभ मिला हैं। जिसमें बुद्ध से संबंधित क्रियाकलापों को उकेरा गया हैं। बौद्ध मूर्तिशिल्प का अनुपम उदाहरण इस स्तंभ से मिलता हैं।
  • 41.सिरपुर उत्खनन से प्राप्त बौद्ध बिहार यूरोपियन मूर्तिशिल्प के स्तंभ की प्राप्ति कौतुहल का विषय हैं। भारतीय मूर्तिशिल्प में मानव की आकृति बनाने की परम्परा नहीं मिलती, किन्तु यूरोप में इसकी परम्परा प्रचलित हैं। कहा जाता हैं। चीनी यात्री ह्वेनसांग के साथ 637 ईस्वी में सिरपुर यात्रा के दौरान कुछ यूरोपियन शिल्पकार भी यहाँ आये थे। उनके प्रभाव से यहाँ मूर्ति का निर्माण होने की जानकारी मिलती हैं
  • 42.सिरपुर उत्खनन से प्राप्त बालेश्वर महादेव के मंदिर का भग्नावशेष। आठवीं शताब्दी की यह कलाकृतियाँ हैं।
  • 43.सिरपुर उत्खनन से प्राप्त आठवीं शताब्दी का बौद्ध बिहार।
  • 44.सिरपुर उत्खनन से प्राप्त भग्नावशेष जिसमें प्राचीन महल के धरोहर प्रदर्शित हैं।
  • सिरपुर उत्खनन से प्राप्त बालेश्वर महादेव के मंदिर का भग्नावशेष। आठवीं शताब्दी की यह कलाकृतियाँ हैं।
  • सिरपुर उत्खनन से प्राप्त आठवीं शताब्दी का बौद्ध बिहार।
  • सिरपुर उत्खनन से प्राप्त भग्नावशेष जिसमें प्राचीन महल के धरोहर
  • ताजमहल की दुर्लभ छायाचित्र विवेकानंद राॅक, कन्याकुमारी
    सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर (8वीं शती) भोरमदेव मंदिर का जलाशय का दृश्य, कवर्धा
    वास्कोडिगामा बीच माही, केरल सर्पाकार वृक्ष बम्हनीडीह, जशपुर
    कवर्धा पहाड़ी का नयनाभिराम दृश्य छत्तीसगढ़ की कृषक महिलाएँ
 
 

 

 

 
 
© 2010 Discover Chhattisgarh. All rights reserved.
Please read our Terms of Use and Privacy Policy.