छत्तीसगढ़ में श्री राम वनगमन मार्ग

सहस्त्राब्दियों में घटित रामायण काल का प्रमाण मिलना दुर्लभ ही नहीं असंभव भी है। नदियों ने मार्ग बदले, पर्वतों ने स्वरूप ,आरण्यों ने दिशायें बदली यदि नहीं बदली तो केवल मनुष्य की आस्था। बाल्मीकि रामायण, कम्ब रामायण, लोमस रामायण, कौशिक रामायण, मंत्र रामायण, नारद रामायण आदि विभिन्न भाषाओं के रामायणों में उद्धृत घटित घटनाएं एवं पात्रों से संबंधित, स्थानों की जनमान्यता वाचिक परम्परा के रूप में सहस्त्राब्दियों से विद्यमान हैं। केवल उन्हें तथ्यों एवं तर्को के आधार पर स्थापित करने की आवश्यकता है।
बीता हुआ हर.......क्षण इतिहास है। इतिहास का प्रमुख स्त्रोत मानव है, मानव अपने अनुभूतियों के साथ प्रचलित जनश्रुतियों एवं किवदंतियों को जोड़कर इतिहास की रचना करता है। लोक कथा, लोक गीत, लोक कला, लोक कहावते एवं मुहावरे ही एक दिन लोकवाणी होकर इतिहास बनती है। जिसमें जन मान्यताओं, आस्थाओं को स्थापित करने के लिये अपने आसपास उसकी मधुर स्मृति के लिये मंदिर, गुफा, स्मारक का निर्माण कर धन्य होता है।
ऐसा ही कुछ त्रेतायुग की ऐतिहासिक काल की घटना को स्थापित करने का विनम्र प्रयास सदियों से होता रहा है। पौराणिक शास्त्रों के अनुसार 9,84,000 वर्ष पूर्व घटी रामायण काल का प्रमाण मिलना दुर्लभ ही नही, असंभव है। पुरात्वविद् एवं इतिहासकार आज रामायण काल का प्रमाण ढूंढते हंै, जो अप्राप्य एवं असंभव है। प्रमाण है तो केवल लोक विश्वास एवं आस्था जिसे न तो मंदिरों की भाॅति तोड़ा जा सका है न ही इतिहास लेखन की तरह मरोड़ा जा सका है।
सदियों से नदी, पर्वत गुफा-कन्दराओं एवं अरण्य को आस्था का केन्द्र मानकर धार्मिकता से जोड़ दिया और सहस्त्राब्दियों की उन घटनाओं की मधुर स्मृति के लिये स्थानों का नामकरण कर गौरवान्वित हुआ। महर्षि बाल्मीकि की रामायण महाकाव्य में वर्णित घटना- क्रमों को तदानुसार महिमा मंडित किया। यही नही उसने ऋषि-मुनियों को उनके आश्रम एवं तपोभूमि को घटित घटनाओं के साथ स्थापित किया गया तथा इसे नदियों, उनके उदगम एवं संगम स्थलों को पर्वतोें, गुफाओं-कन्दराओं को जोड़कर मान्यतायंे दी गयी और वही स्थल आज जनमानस के लिये पुण्य स्थली बन गयी। ऐसा ही श्री राम वनगमन मार्ग के लिये हुआ अपने को राम मय बनाने के लिये अपने आसपास के नदी-जलाशय, पर्वत, कन्दराओं एवं आरण्य स्थलो को जोड़कर वन गमन मार्ग बताया गया जिसे क्षेत्रीय इतिहास कहा जाता है। एक ही ऋषि के कई आश्रम एवं तपोभूमि मिलते है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि ऋषिवर किसी एक स्थान से बंधित नही थे वे स्वतंत्र होकर विचरण किया करते थे। फलस्वरुप अलग-अलग स्थानों में इनके आश्रम मिलते हैं।
प्रकृति ने करवट ली भौगोलिक परिवर्तन हुये इनमें कुछ नदियाॅ विलुप्त हो गयी कुछ पर्वत धरातल में चले गये, किन्तु उसके नाम एवं स्थान की मौलिकता को मिटाया नही जा सका। यही कारण है कि महाकाव्य में वर्णित स्थलो को अब उसके अनुसार श्रृंखलाबद्ध नही किया जा सकता। अपितु श्रीराम वनगमन मार्ग को नदियों के तट से जोड़कर, वनमार्ग का सहारा लेकर तो कही पर्वतीय तलहटी क्षेत्रों में बने गु्फाओं एवं कन्दराओं से होकर पथगमन की बात करना श्रेयकर प्रतीत होता है। रामायण में वर्णित वनों का वानस्पति अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि उनमें दर्शित अधिकांश वन इसी क्षेत्र में संरक्षित हैं। जैसे- साल वन, पिप्लिका वन, मधुबन, केसरी वन, मतंगवन, आम्रवन आदि प्रमुख हैं। वानस्पतिक अध्ययन से यह तथ्य प्रकाश में आया है कि छत्तीसगढ़ क्षेत्र के मतंग वन अर्थात् शिवरीनारायण मंदिर के पास एक ऐसा वट वृक्ष हैं, जिसके दोने के आकार में पत्ते हैं। इस दुर्लभ वृक्ष को माता शबरी द्वारा भगवान श्रीराम को बेर खिलाने की प्रसांगिकता मिलती हैं। इसी प्रकार बस्तर क्षेत्र में दंतेवाड़ा में स्थित माँ दंतेश्वरी क्षेत्र में स्थित वन में एक ऐसा दुर्लभ बेल वृक्ष हैं, जिसमें नौदल एवं बारहदल के पत्ते इस वृक्ष में होते हैं। इस संबंध में भी जनश्रुतियाँ है कि भगवान श्रीराम वनगमन करते समय शंखनी एवं डंकनी नदी के संगम तट पर दंतेवाड़ा पहुँचे होंगे एवं अपनी ईष्टदेव शिवजी का अभिषेक नदी तट पर जिस बेल के पत्ते से किये थे। ये वही बेल वृक्ष है जिसमें सामान्यतः 9-12 दल के पत्ते मिलते हैं। कहा जाता है कि इस क्षेत्र में कभी ऐसे वृक्षों का सम्पूर्ण क्षेत्र था। अब उसमें से एक-दो वृक्ष ही शेष रह गये हैं। उपरोक्त वानस्पतिक प्रमाण रामवनगमन मार्ग की तथ्यों की पुष्टि करती हैं। उल्लेखनीय है कि वनवास काल में सीता जी उनके साथ थी अतः पर्वत को लाॅघने का तर्क देना उचित नही हैं।
बाल्मीकि रामायण के अनुसार रामचन्द्र जी वनवास काल में अयोध्या से विभिन्न पवित्र नदियों से होकर चित्रकुट पहॅुचे थे, जहाॅ उनका भरत मिलाप हुआ था। तदानुसार उन स्थानों में तमसा नदी, वेेदश्रृति नदी, गोमती नदी, बालुकिनी नदी एवं गंगा नदी पार कर भारद्वाज आश्रम पहूॅचने का उल्लेख मिलता है। उक्त मार्ग में बाल्मीकि आश्रम, माण्डव्य आश्रम, गुप्तगोदावरी, अत्रि आश्रम, सुतीक्ष्ण आश्रम, शरभंग आश्रम, अगस्त्य आश्रम, मार्कण्डेय आश्रम होकर चित्रकूट पहुॅचे थे। चित्रकूट से रामचन्द्र ही नदियों के तट से दक्षिणपथ जाने के लिये दण्डकारण्य में प्रवेश किये थे।
दण्डकारण छत्तीसगढ़ के भू-भाग को कहा जाता था। गंगा नदी के कछार से लेकर गोदावरी के कछार के मध्य के भू-भाग को दण्डकारण्य कहा जाता है। छत्तीसगढ़ उन दिनों दक्षिण कोसल के नाम से अभिज्ञात था। छत्तीसगढ़ के लोक गीत अथवा बच्चो के खेल गीत में सीताजी की व्यथा-दण्डकारण की भौगोलिकता एवं उसके वनस्पतियो का वर्णन कुछ इस प्रकार है:-
अटकन बटकन दही चटाका, लउहा लाटा, बन में काॅटा ।
सावन में करेला फुले, चल-चल बिटुआ गंगा जाबो,
गंगा से गोदावरी, पाका-पाका बेल खाबो
बेल के डारा टूटगे, भरे कटोरा फूटगे, अउ ब्याहता छूटगे ।
उक्त खेल गीत का अर्थ इस प्रकार है:-
अटकन-बटकन (दण्डक वन में अटक गये -भटक गये) लउहा लाटा दही चटाका, बन में काॅटा (वन इतना सधन है कि यहाॅ इमली, आम व बेर के वृक्ष जो चटखारे एवं खट्टे थे। बेल और बबूल के झाडियों के स्पर्श से खून निकल गया तो कही हाॅथ चिपक गया अर्थात् यहाॅ साल एंव बबूल के वृ़क्ष थे, जिसमें गोंद निकलता है। सावन का महिना प्रियतम से मिलने का होता है ऐसे माह में करेला का फूलना प्रियतम से कडुवाहट का प्रतीक है। सीताजी इन परिस्थितियों में व्यथित होकर कहती है कि बेटा (लव-कुश) यहाॅ से गंगा चले और गंगा से गोदावरी-दण्डकारण क्षेत्र में वहाॅ बेल का वृक्ष है अर्थात यह शिव जी का क्षेत्र है। वहाॅ जाकर पके-पके बेल खायेगें किन्तु बेल की डाली इतनी मजबूत होती है वह भी टूट गया अर्थात पति-पत्नी का प्रगाढ़ संबंध बेल की डाली की तरह मजबूत होती वह भी टूट गया और ब्याहता पति (रामचन्द्र जी) से साथ छूट गया एवं भरा कटोरा अर्थात धान का कटोरा भी फुट गया (यहाॅ कटोरा समृद्धि का प्रतीक है) वह भी बिखर गया।
यह खेल गीत की प्रासांगिकता में सीता जी के दण्डक वन में भटकने एवं अपने प्रियतम राम से साथ छूटने की व्यथा को बताते हुये इस दण्डक वन के वृक्षो का उल्लेख तथा गंगा से गोदावरी तक दण्डकारण्य होने की पुष्टि होती है।
बाल्मीकि जी ने रामायण के अरण्यकाण्ड में दण्डकारण्य के आश्रमों में राम के पहुॅचने का वर्णन इस प्रकार किया है , यथाः-
प्रविश्य तु महारण्यं दण्डकारण्यमात्मवान् ।
रामो ददर्श दुर्धर्षस्तापसाश्रममण्डलम् ।।
दण्डकारण्य नामक महान वन में प्रवेश करके मन को वश में रखने वाले दुर्जय वीर श्री राम ने तपस्वी मुनियों के बहुत से आश्रम देखे ।
कुशचीरपरिक्षिप्सं ब्राम्हयालक्ष्या समावृतम् ।
यथा प्रदीप्तं दुर्दश गमने सूर्यमण्डलम् ।2।
अभ्यास से प्रकट हुये विलक्षण तेज से व्याप्त था, इसलिये आकाश में प्रकाशित होने वाले वहाॅ कुश और वल्कल वस्त्र फैले हुये थे । यह आश्रम मण्डल ऋषियों की ब्रम्हविधा के दुर्दर्श सूर्य-मण्डल की भाॅति वह भूतल पद्दीप हो रहा था । राक्षस आदि के लिये उसकी ओर देखना भी कठिन था ।2।
शरण्यं सर्वभूतानां सुसम्मृष्टाजिरं सदा ।
मृर्गर्बहुभिराकीर्ण पक्षिसंपेः समावृत्तम ।3।
वह आश्रम समुदाय सभी प्राणियों को शरण देने वाला था । उसका आॅगन सदा झाड़ने -बुहारने से स्वच्छ बना रहता था । वहाॅ बहुत से वन्य पशु भरे रहते थे और पक्षियों के समुदाय भी उसे सब ओर से धेरे रहते थे ।3।
पूजितं चोपनृत्तं च नित्यमप्सरं गणेै ।।
विशालैरग्निशरणैः सुग्भाण्डेैरजिनैः कुशैः।4।
सामिघ्दिस्तोयकलशैः फलमूलैश्च शोभितम् ।
आरण्वेश्च महावृक्षेैः पुण्येः स्वादुफलैर्वृतम ।5।
वहाॅ का प्रदेश इतना मनोरम था कि अप्सरायें प्रतिदिन आकर नृत्य करती थी । उस स्थान के प्रति उनके मन में बड़े आदर का भाव था । बड़ी-बड़ी अग्निशालायें, सुवा आदि यज्ञपात्र ,मृगचर्म, कुश ,समिधा जलपूर्ण कलश तथा फल-फूल उसकी शोभा बढ़ाते थे । स्वादिष्ट फल देने वाले परम पवित्र तथा बड़े-बड़े वन्य वृक्षों से वह आश्रम मण्डल धिरा हुआ था ।ं4-5।
ते वयं भवता रक्ष्या भवव्दिषयवासिक ।
नगरस्थों वनस्थो वा त्व ंनो राजा जनेश्वर ।20।
हम आपके राज्य में निवास करते हैं ,अतः आपको हमारी रक्षा करनी चाहिये ।आप नगर में रहें या वन में, हम लोगों के राजा ही है । आप समस्त जन समुदाय के शासक एवं पालक हैं 20।

छत्तीसगढ़ में श्री राम वनगमन मार्ग
अयोध्या नरेश राजा दशरथ के द्वारा 14 वर्षो की वनवास आदेश के मिलते ही रामचंद्र जी, सीताजी एवं लक्ष्मण जी के साथ माता-पिता का चरण स्पर्श कर ,राजपाट छोड़कर अयोध्या से प्रस्थान किये, उस समय अयोध्या वासी उनके साथ-साथ तमसा नदी के तट तक साथ-साथ गये एवं अपने प्रिय प्रभु को तमसा नदी पर अंतिम बिदाई दी।
रामचंद्र जी तमसा नदी पार कर बाल्मीकि आश्रम पहंुचे जो गोमती नदी के तट पर स्थित हैं। प्रतापपुर से 20 कि.मी. राई मंदिर के पास बकुला नदी प्रवाहित होती है कि जो बाल्मीकि ऋषि के नाम पर नदी का नाम बकुला पड़ा। इसके बाद नदी के तट से सिंगरौल पहुंचे, सिंगरौल का प्राचीन नाम सिंगवेद है। यहां नदी तट पर निषादराज से भेंट हुई। इसे निषादराज की नगरी के नाम से जाना जाता हैं। यह गंगा नदी के तट पर स्थित हैं। सीताकुण्ड के पास रामचंद्र जी गंगा जी को पारकर श्रृंगवेरपुर पहुंचे, इस श्रृंगवेरपुर का नाम अब कुरईपुर हो गया हैं। कुरईपुर से यमुनाजी के किनारे प्रयागराज पहुंचे। प्रयागराज से चित्रकूट पहुंचे। चित्रकूट में राम-भरत मिलाप हुआ था। यहां से अत्रि आश्रम पहुंचकर दण्डक वन में प्रवेश किया। दण्डक वन की सीमा गंगा के कछार से प्रारंभ होती हैं। यहाँ से आगे बढ़ने पर मार्ग मंे शरभंग ऋषि का आश्रम मिला, वहां कुछ समय व्यतीत कर सीता पहाड़ की तराई में बने सूतीक्ष्ण ऋषि से मिलने गये। तत् पश्चात वे अगस्त्य ऋषि के आश्रम पहुंचे। उन दिनों मुनिवर आर्यों के प्रचार-प्रसार के लिये दक्षिणापथ जाने की तैयारी में थे। मुनिवर से भेंट करने पर मुनिवर ने उन्हें गुरू मंत्र दिया और शस्त्र भेंट की। आगे चलकर मार्ग में ऋषि-मुनियों को विघ्न पहुंचाने वाले सारंधर राक्षस का संहार किया, फिर सोनभद्र नदी के तट पर पहुंचकर, वहाँ पर स्थित मार्कण्डेय ऋषि का आश्रम में मार्कण्डेय ऋषि से भेंट करने के बाद सोनभद्र एवं बनास नदी के संगम से होकर बनास नदी के मार्ग से सीधी जिला (जो उन दिनों सिद्ध भूमि के नाम से विख्यात था) एवं कोरिया जिले के मध्य सीमावर्ती मवाई नदी (भरतपुर) पहुंचे और मवाई नदी को पारकर दण्डकारण्य में प्रवेश किये। मवाई नदी ,एवं बनास नदी का भरतपुर के बरवाही ग्राम के पास संगम होता हैं। अतः बनास नदी से होकर मवाई नदी तक पहुंचे, मवाई नदी पर भरतपुर के पास पारकर दक्षिण कोसल का दण्डकारण्य क्षेत्र (छत्तीसगढ़) में प्रवेश किये।
दक्षिण कोसल (छत्तीसगढ़) में मवाई नदी के तट पर उनके चरण स्पर्श से छत्तीसगढ़ की धरा पवित्र हो गयी । इन्होने नदी तट पर बने प्राकृतिक गुफा मंदिर सीतामढ़ी हरचैका मंे पहुंच कर विश्राम किये । इस प्रकार रामचंद्र जी के वनवास काल का छत्तीसगढ़ में पहला पड़ाव भरतपुर के पास सीतामढ़ी हरचैका को कहा जाता हैं। मवाई नदी के तट पर बने प्राकृतिक गुफा को काटकर छोटे-छोटे 17 कक्ष बनाये गये हैं। जिसमें द्वादश शिवलिंग अलग-अलग कक्ष में स्थापित हैं। वर्तमान में यह गुफा मंदिर नदी तट के समतल करीब 20 फीट रेत पट जाने के कारण हो गया है।। यहाँ रामचंद्र जी ने वनवास काल में पहुंचकर विश्राम किया । इस स्थान का नाम हरचैका अर्थात् हरि का चैका अर्थात् सीता रसोई के नाम से प्रसिद्ध हैं। रामचंद्रजी यहां शिवलिंग की पूजा अर्चना कर कुछ समय व्यतीत किये इसके बाद वे मवई नदी से होकर रापा नदी के तट पर पहुंचे। रापा नदी कटर्राडोल (सेमरिया) के पास बनास नदी से मिलती हैं। मवाई नदी बनास की सहायक नदी हैं। रापा नदी के तट से होकर सीतामढ़ी धाधरा पहुंचे। यह नदी तट पर बना प्राकृतिक गुफा नदी तट से करीब 20 फीट ऊंचा हैं। यहाॅ पर 4 कक्ष वाला प्राकृतिक गुफा हैं। गुफा के मध्य कक्ष में शिवलिंग स्थापित है तथा दाहिने, बांये दोनांे ओर एक-एक कक्ष है जो मध्य की गुफा के सम्मुख होने के कारण दो गुफा के सामने से रास्ता परिक्रमा के लिये बनाया गया हैं। इन दोनांे कक्ष में राम-सीताजी ने विश्राम किया , सामने की ओर अलग से कक्ष है जो लक्ष्मण जी रक्षक के रूप में इस कक्ष में बैठकर पहरा दिया था।सीताजी यहॅा विश्राम की थी इसी कारण से इसे सीतामढ़ी धाधरा कहते है। कुछ दिन व्यतीत कर वे धाधरा से कोटाडोल पहुंचे। इस स्थान में गोपद एवं बनास दोनों नदी का संगम हैं। कोटाडोल एक प्राचीन एवं पुरातात्विक स्थल हैं, कोटाडोल में मौर्यकालीन अवशेष मिले है। इस स्थान का सम्राट अशोक के समय अत्यधिक महत्च था। कोटाडोल से होकर वे नेउर नदी के तट पर स्थित सीतामढ़ी छतौड़ा आश्ë