छत्तीसगढ़ के लोकनृत्य-लोकसंगीत

छत्तीसगढ़ को परम्पराओं का गढ़ कहा जाता हैं। छत्तीसगढ़ की लोकनृत्य, लोकगीत एवं लोकसंगीत की परम्परा अति प्राचीन है। यहाँ के पारम्परिक लोकनृत्य, लोकगीत एवं लोकसंगीत पर प्रथम बार यह कृति तैयार की गई हैं, जिसमें लोकगीत, लोकनृत्य का संग्रह हैं। इस कृति में सुआ, पंथी, गौरा, राऊत, भोजली, कर्मा नृत्य, फाग, गेड़ी, ककसार, डण्डारी आदि तथा लोकगीतांे में बाँस गीत, देवार, ददरिया, पण्डवानी, जँवारा, भरथरी, बसदेवा, सोहर एवं विवाह गीत आदि तथा वाद्ययंत्र में धनकूल, चिकारा, सारंगी, किन्दरी, तम्बूरा, निसान, दफड़ा, नगाड़ा, खन्जेरी, माँदर, खड्ताल, मन्जिरा, अलगोजवा, तूतरू, मोहरी, बाँस, सिंगबाजा, टुनटुनी आदि का लोकवाद्य के संबंध में जानकारी इस कृति की उपलव्धि है। छत्तीसगढ़ के दुर्लभ लोकवाद्यों का संकलन हैं। (प्रकाशनाधीन)

 








 

 

 

 
 
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