छत्तीसगढ़ के पारम्परिक व्यंजन

छत्तीसगढ़ अपने पारम्परिक व्यंजन के कारण पूरे देश में प्रसिद्ध हैं। इस अंचल के पारम्परिक व्यंजन का यदि कोई पर्यटक स्वाद लेता है, तो वह इस स्वाद को कदापि नहीं भूलता। वह बार-बार यहाँ आकर उन व्यंजनों का लुप्त उठाना चाहता हैं। यहाँ के चीला, फरा, ठेठरी, खुरमी, चैसीला, खीर, लड्डू, अईरसा, देहरौरी, पपची, गुजिया, लपसी, गुलगुला, पकवा, पिड़िया, सोहारी, भजिया, बैचांदी, सिंघारा, तीखूर आदि अनेक व्यंजन एवं खाद्य सामग्री है, जो ऋतु के अनुसार एवं त्यौहार के अनुसार बनाये जाते हैं। इनमें फास्टफूड के रूप में चीला एवं लपसी को माना जाता है तथा स्वीटडीश के रूप में दूध फरा एवं खीर को खाने की परम्परा हैं। इन पकवानों की परम्परागत निर्माण आज भी घरों में की जाती हैं। इस कृति में विभिन्न प्रकार के भाजी का भी वर्णन हैं। छत्तीसगढ़ में झाड़ की भाजी से लेकर पानी की भाजी, बेल (नार) की भाजी तथा जमीन की भाजी होती है, जैसे कि बोहार भाजी, मुनगा भाजी आदि तथा नार की भाजी में पोई की भाजी, कुम्हड़ा भाजी, कान्दा भाजी इसी प्रकार जड़ (जमीन) की भाजी में लाल, चैलाई, पालक, भथुआ, चेच भाजी, सरसों, पटवा भाजी, चना भाजी, तिवरा भाजी, जड़ी भाजी आदि एवं पानी की भाजी में तिनपनिया, चुनचुनिया, करमता भाजी आदि भाजी है। इसलिए छत्तीसगढ़ में भाजी में भगवान कहा जाता हैं। इन सभी का इस कृति में लेख किया गया हैं। यह कृति छत्तीसगढ़ के व्यंजन के संबंध में एक दुर्लभ कृति है, जिसमें बनाने की विधि एवं उसकी महत्ता को दर्शाया गया हैं। यह एक उपयोगी कृति हैं। (प्रकाशनाधीन)



 

 

 








 

 

 

 
 
© 2010 Discover Chhattisgarh. All rights reserved.
Please read our Terms of Use and Privacy Policy.