छत्तीसगढ़ के आभूषण एवं पोषाक

नारी का श्रृंगार गहना को माना जाता हैं। सदियों से नारी गहनों के प्रति लालायित रहती हैं। छत्तीसगढ़ में नारी के श्रृंगार के रूप में आभूषण (गहने) का महत्वपूर्ण स्थान हैं। छत्तीसगढ़ की पारम्परिक गहनों में सिर से पैर तक के आभूषणों का विवरण इस कृति की उपलब्धि हैं। प्रथम बार छत्तीसगढ़ के पारम्परिक आभूषणों का संकलन एवं उसकी महत्ता को लेखकर यह कृति तैयार की गई हैं। इस कृति में छत्तीसगढ़ के जेवर, झुमका, खिनवा, लुरकी, तितरी, करणफूल, खूँटी, फूल्ली, लवंगफूल, नथनी, सूर्रा, सूतिया, पुतरी, हंसली, चैनफाँस, संकरी, कंकनी, ऐठी, कड़ा, पटा, करधन, नागमोरी, साँटी, पैजन, तोड़ा, बिछिया आदि एवं पहनावा में लुगरा, पोलखा, लहगा, साया, लुगरी, पागा, कुरता, धोती, बण्डी, अंगरखा, सलुखा, कमीज आदि भी स्त्री और पुरूष दोनों के पारम्परिक पोषाको का भी वर्णन इस कृति की विशेषता हैं। इस कृति में उल्लेखित गहने एवं पोषाक अब विलुप्त होने की स्थिति में हैं। इनका प्रलचन भी अब कम हो गया हैं, किन्तु छत्तीसगढ़ की सामाजिक एवं पारम्परिक अस्मिता में इनका महत्वपूर्ण योगदान है, इसलिए यह दुर्लभ मानी जाती हैं। (प्रकाशनाधीन)








 

 

 

 
 
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