सरगुजा

प्राचीन काल में सरगुजा दण्डकारण्य क्षेत्र के अंतर्गत माना जाता था। त्रेतायुग में भगवान श्रीराम दण्डकारण्य में इसी क्षेत्र से प्रवेश किये थे। इसीलिए इस क्षेत्र का पौराणिक महत्व हैं। सरगुजा प्रकृति की अनुपम देन हैं। प्राकृतिक सौन्दर्यता के कारण यह ऋषि-मुनियों की तपोस्थली के रूप में विख्यात रहा हैं। इस क्षेत्र में अनेक संस्कृति का अभ्यूदय हुआ। उनके पुरातात्विक धरोहर आज भी इनकी स्मृति में विद्यमान हैं। जैसे रामगढ़, लक्ष्मणगढ़, कुदरगढ़, देवगढ़, महेशपुर, सतमहला, जनकपुर, डीपाडीह, मैनपाट, जोकापाट, सीताबेंगरा-जोगीमारा (प्राचीन नाट्यशाला) तथा यहाँ के अनेक जलप्रपात भी हैं। यहाँ की सुरम्य वादियाँ पर्यटकों का मन मोह लेती हैं। सरगुजा का नामकरण स्वर्ग-जा अर्थात् स्वर्ग की पुत्री के रूप में की जाती हैं। गजराज की भूमि सरगुजा आज भी अतीत का गौरवशाली इतिहास बताते हुए विद्यमान हैं। इन सभी का वर्णन इस कृति में किया गया हैं। यह कृति दो भाग में प्रकाशित की जा रही हैं।



 



 

 

 








 

 

 

 
 
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